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Showing posts from September, 2021

पंजाब की राजनीतिक उठापठक व चिन्ताएं

वैदिक ऋषियों, सन्तों, शूरवीरों और गुरुओं की पवित्र भूमि पंचनद प्रदेश #पंजाब एक बार पुनः राजनैतिक संकट में है और यह संकट आगे बढ़कर एक भीषण आपदा का रूप लेगा इसमें कोई सन्देह नही है।  आज पंजाब ड्रग्स माफियाओं की गिरफ्त में फंस चुका है, युवा पीढ़ी अब गुरु साहिबानों के खालसा नही रहे वो हिप्पी बन रहे है। विदेशी ताकतें पुरजोर तरीके से नशे की खेप के साथ-साथ विखंडनकारी सोच भी पंजाब के लोगों के मन में पहुंचा चुकी है। खलिस्तान का प्रोपगंडा फिर से आजमाया जा रहा है, किसान आंदोलन इसी का परिणाम है।  ईसाई मिशनरियों द्वारा पंजाब के गरीब और सीधे-सादे लोगों खासकर वंचित वर्ग के हिन्दू-सिखों को गीता और गुरुवाणी से विमुख करने का षड्यंत्र वर्षों से चल ही रहा है और वे सफल भी हो रहे है, उन्हें सत्ता के शीर्षस्थ लोगों का आशीर्वाद प्राप्त है क्योंकि पंजाब में वेटिकन के प्रतिनिधियों की सरकार है। जयभीम-जयमिम के सरपरस्त भी जी जान से हिन्दू-सिख एकता को तोड़ने में लगे हुए हैं।  राजनीतिक स्तर पर विभिन्न दलों की नूराकुश्ती, अकालियों द्वारा केंद्र की भाजपा सरकार से समर्थन वापसी, आम आदमी पार्टी की वामपंथियों क...

भारतीय ऋषि परम्परा के संवाहक : पण्डित दीनदयाल उपाध्याय

भारत भूमि ऋषियों और मनस्वियों की जन्मदात्री है, समय-समय पर यहाँ ऐसी मेधाएँ प्रकट हुई जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन देश और समाज के उत्थान व उन्नयन में समर्पित कर एक उच्च वैचारिक दर्शन हमें प्रदान किया, ऐसे ही महामनीषियों में से एक थे एकात्म मानवदर्शन के प्रतिपादक पण्डित दीनदयाल उपाध्याय। आज पण्डित दीनदयाल जी का नाम और उनका वैचारिक दर्शन किसी परिचय से वंचित नही है, विगत 7 वर्षों से केंद्र में वर्तमान और पूर्व की भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए गठबंधन सरकारों ने केंद्र और राज्यों में जनकल्याण के, समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के लिए जितने भी काम किए उन सबमें उपाध्याय जी का एकात्म मानव दर्शन स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। अंत्योदय और गरीब कल्याण जैसी योजनाएं इसी का ही रूप है। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी के माता-पिता श्री भगवती प्रसाद और माता रामप्यारी देवी मथुरा जिले के नगला चंद्रभान के मूल निवासी तथा अत्यंत ही साधारण परिवार से थे। दीनदयाल जी का जन्म दिनाँक 25 सितम्बर 1916 को उनके नाना श्री चुन्नीलाल शुक्ल के यहाँ राजस्थान के धानक्या (जयपुर-अजमेर रेल मार्ग) में हुआ। उनके नाना रेलवे में ...

मैं और मेरी हिन्दी

मेरी हिन्दी का श्रीगणेश विद्यालय के इतर बलदेवराज चौपड़ा जी निर्मित दूरदर्शन धारावाहिक #महाभारत के संवाद सुनकर हुआ। पण्डित नरेंद्र शर्मा व डॉ राही मासूम रजा द्वारा शुद्ध संस्कृत निष्ठ हिन्दी में रचे गए कालजयी संवाद महाभारत की आत्मा है। इन्हें सुनकर दोहराने का अभ्यास करते-करते यह जिव्हा पर आसीन हो गई। भ्राता हेमन्त के साथ निरन्तर आपसी वार्तालाप के अभ्यास से हमें इसकी सिद्धता होने लगी।  आगे चलकर जब विद्यालय के पुस्तकालय में पुस्तकों का महासागर देखा तो जो पहला गोता लगाया तब से आज तक उसमें ही 'जो डूबा सो पार...' का असीम आनन्द उठा रहे है। पंचतंत्र, जातक कथाओं, महाभारत के पात्र, प्रेमचंद की कहानियां, उस समय की प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिकाएं यथा नन्दन, चंपक, चन्दामामा, पराग, नन्हे सम्राट, बालहंस, और भी अन्य तथा बढ़ती वय के साथ कादम्बरी, कादम्बिनी, धर्मयुग, सरिता, मुक्ता और मूर्धन्य लेखकों की अनुपम कृतियों ने मेरी हिन्दी को एक उच्च आधार प्रदान किया। पाठ्यक्रम की हिंदी पुस्तकों से गहरा लगाव होता गया। संघ शाखा की नियमितता, उसमें नित्य बोले जाने वाले सुभाषित, लघु कथाओं, अमृत वचन व लघु...

पर्युषण और क्षमापना पर्व सम्वत्सरी

सनातन धर्म व संस्कृति में शरीर और आत्म शुद्धि हेतु पवित्रता पर विशेष बल दिया गया है, बाहरी पवित्रता देह की होती है तथा आंतरिक पवित्रता मन की , इसके लिये महर्षि पतञ्जलि ने योगदर्शन में योग को  "योगश्चितवृतिनिरोधः" कह परिभाषित किया है।  सनातन के प्रमुख अंग जैन मत में भी इसे स्वीकार किया गया तथा देह व आत्मशुद्धि हेतु तपस्या पर विशेष बल दिया गया, यह तपस्या वास्तव में अष्टांग योग के यम-नियम की पालना ही है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह यम है तथा पवित्रता, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणिधान नियम है। चातुर्मास काल मे आने वाला आठ दिवसीय पर्युषण पर्व मूलतः तपस्या का ही पर्व है , तपस्या अर्थात मन और इंद्रियों का संयम करते हुए धर्म का पालन करना तथा उसके लिए कष्ट सहन करना और तितिक्षा एवं व्रतादि का नाम ही तपस्या है।  आचार्य गुरु भगवन्तों के पावन सानिध्य में मुमुक्षु भाव से तपस्या रत होकर जीवात्मा को दोष रहित बनाकर, उसे कर्म के कषाय से मुक्त करना ही साधक का प्रमुख कर्तव्य है। आत्मा के भीतरी कलुष परिणाम को कषाय कहते हैं। क्रोध, मान, माया, लोभ, ये चार ही कषाय...

वैदिक नायक देवता : श्री महागणपति जी

सनातन धर्म और संस्कृति में अनादिकाल से ही प्रथम पूज्य देवता के रूप में विघ्नहर्ता भगवान गणेश जी की पूजा आराधना का विधान प्रचलित है। वेदों, पुराणों, स्मृतियों तथा महाकाव्यों सहित समस्त सनातन ग्रन्थों में श्री गणेश जी का वर्णन है। विश्व की अति प्राचीन संस्कृतियों, सभ्यताओं में भी गणपति पूजन की परम्परा रही है, आज जब संसार के विभिन्न स्थानों पर पुरा महत्व के स्थलों का उत्खनन होता है तो अमेरिका, अफ्रीका से लेकर इंडोनेशिया, रूस तक हमें गणपति वंदना के प्रमाण रूप में उनकी प्रतिमाएं मिलती है।  गणपति जी वैदिक देवता है ऋग्वेद में उनका उल्लेख इस मंत्र से किया गया है, ऋग्वेद में उन्हें ब्रह्मणस्पति भी कहा गया है। ||गणांना त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तम् जेष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पतआ  नःशृण्वत्रूतिभिः सीद सादनम् || अर्थात - हे गणों के अधिपति, हे गणनायक, हे, विद्वानों में श्रेष्ठ और ब्रह्म से भी श्रेष्ठ, आप हमारी विनती को, निवेदन को सुने और स्वीकार करें। शुक्ल यजुर्वेद में एक मंत्र है- गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे  |निधीनां त्व...

शिक्षक दिवस

 शिक्षक दिवस पर समस्त शिक्षकवृन्दों को सादर प्रणाम करते हुए शुभकामनाएं प्रदान करता हूँ। ---- भारतीय सन्दर्भ में शिक्षा व शिक्षक का विशेष महत्व व हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। सनातन संस्कृति में गुरु परम्परा अनादि काल से स्थापित है तथा आगे भी यथावत रहेगी। यह देश ऋषि परम्पराओं को मानने वाले लोगों का देश है, राष्ट्रोंमुखी चरित्र निर्माण का कार्य इस देश की गुरु परम्परा ने सदैव किया है, यहां सन्तान जब गुरुकुल में प्रविष्ट होती थी उसी दिन से वो गुरु की संपति बन जाती थी तथा गुरु उस हाड़-माँस के सजीव प्राणी में उच्च संस्कारों, दिव्य ज्ञान और श्रेष्ठ गुणों की प्रतिष्ठा कर उसे समाज के लिए अनुकरणीय, वन्दनीय व्यक्तित्व बना देते थे।  हमारे वेदों, उपनिषदों में शिक्षा एक संकुचित अर्थों का शब्द है, हमारे यहां विद्या का महत्व है, आजकल शिक्षा और विद्या एक ही मान लिया गया है यही भृम अनेक समस्याओं की जड़ है। शिक्षा की पूर्णता हो सकती है विद्या की नही, मनुष्य जीवन भर शिक्षार्थी नही रह सकता है परन्तु उसे सदैव विद्यार्थी रहने का शास्त्र निर्देश है, यही उसकी उन्नति का मार्ग है। यहां ह...