Skip to main content

मैं और मेरी हिन्दी

मेरी हिन्दी का श्रीगणेश विद्यालय के इतर बलदेवराज चौपड़ा जी निर्मित दूरदर्शन धारावाहिक #महाभारत के संवाद सुनकर हुआ। पण्डित नरेंद्र शर्मा व डॉ राही मासूम रजा द्वारा शुद्ध संस्कृत निष्ठ हिन्दी में रचे गए कालजयी संवाद महाभारत की आत्मा है। इन्हें सुनकर दोहराने का अभ्यास करते-करते यह जिव्हा पर आसीन हो गई। भ्राता हेमन्त के साथ निरन्तर आपसी वार्तालाप के अभ्यास से हमें इसकी सिद्धता होने लगी। 

आगे चलकर जब विद्यालय के पुस्तकालय में पुस्तकों का महासागर देखा तो जो पहला गोता लगाया तब से आज तक उसमें ही 'जो डूबा सो पार...' का असीम आनन्द उठा रहे है। पंचतंत्र, जातक कथाओं, महाभारत के पात्र, प्रेमचंद की कहानियां, उस समय की प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिकाएं यथा नन्दन, चंपक, चन्दामामा, पराग, नन्हे सम्राट, बालहंस, और भी अन्य तथा बढ़ती वय के साथ कादम्बरी, कादम्बिनी, धर्मयुग, सरिता, मुक्ता और मूर्धन्य लेखकों की अनुपम कृतियों ने मेरी हिन्दी को एक उच्च आधार प्रदान किया। पाठ्यक्रम की हिंदी पुस्तकों से गहरा लगाव होता गया।

संघ शाखा की नियमितता, उसमें नित्य बोले जाने वाले सुभाषित, लघु कथाओं, अमृत वचन व लघु बौद्धिक सूत्रों ने मुझे भाषाई पकड़ के साथ बोलने का अभ्यस्त किया। जीवन-धारा बदलने वाले आदरणीय  प्रचारकों व पदाधिकारियों के विभिन्न कार्यक्रमों में दिए जाने वाले बौद्धिक सम्बोधनों तथा पाञ्चजन्य, पाथेय कण व अन्य संघ साहित्यों के अध्ययन से मुझे संस्कृतनिष्ठ परिष्कृत हिंदी की वाक व लेखन सिद्धता का आशीर्वाद मिला। 

हिन्दी साहित्य की भक्तिकालीन, रीतिकालीन व आधुनिक धारा के मनीषियों कबीर जी, रैदास जी, तुलसीदास जी, जयशंकर प्रसाद जी, महादेवी वर्मा, पंत जी, निराला जी, रामधारी सिंह दिनकर जी, दुष्यंत कुमार जी, मैथिलीशरण गुप्त जी, माखनलाल चतुर्वेदी जी, आदरजोग अटलबिहारी जी की रचनाओं ने मुझमें लयबद्धता का विकास किया। 

गीता प्रेस गोरखपुर, गायत्री परिवार द्वारा प्रकाशित धर्मग्रंथों व सद्साहित्य ने आध्यात्मिक हिंदी का समावेश किया जो मेरी अमूल्य निधि है। इससे मेरी लेखन शैली को सुदृढ़ता व धार प्राप्त हुई।

आज अकादमिक रूप से अंग्रेजी पर भी यथा योग्य पकड़ है, देवनागरी लिपि की उर्दू भाषा पढ़ने, समझने तथा उसमें शे'र, ग़ज़ल लिख लेने की अतिरिक्त योग्यता प्राप्त है परन्तु प्राण केवल हिन्दी में बसते है वो ही इसका श्वास है। भारत को, भारत के गौरवशाली अतीत को, भारतीय दृष्टिकोण से विश्व को समझने की तितिक्षा का समाधान बिना हिन्दी के असम्भव है। 

मातृभाषा सम्माननीय है यह हमारी व्यष्टि की पूर्णता है, राष्ट्रभाषा समष्टि का आरम्भ है, दोनों वन्दनीय है।

आइये सङ्कल्प ले की हमारी हिन्दी हमारी रगों में रक्त बनकर बहे, हमारी सर्वांगीण उन्नति का कारण बने, हिन्दी हम हिन्दवियों के ललाट पर बिंदी बनकर नही ज्ञान का त्रिपुण्ड बनकर दमके, हिंदी किसी एक दिवस की शोभा मात्र नहीं अपितु हमारे हृदय मन्दिर में अखण्ड दीप सम प्रज्वल्लित हो।

शब्द और वाणी के अधिष्ठाता देव श्री गणेश जी, माता वाग्देवी जी को नमन करते हुए आज हिंदी दिवस पर यही विनम्र प्रार्थना। 


✒️©️ नरेश कुमार बोहरा "नरेन्द्र"

 #हिंदी_दिवस

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

अखण्ड भारत और विभाजन की विभीषिका स्मृति दिवस

 #विभाजन_विभीषिका_स्मृति_दिवस  #अखण्ड_भारत_स्मृति_दिवस  1947 में भारतवर्ष का विभाजन विश्व इतिहास की सबसे रक्तरंजित घटना थी। मुगलों के आगमन के समय जो भारत 1 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में विस्तारित था वो 14 अगस्त 1947 के त्रासदीपूर्ण, अनियोजित, अस्वीकार्य दो राष्ट्र में बदलने के गोरे और काले अंग्रेजों के कपटपूर्ण निर्णय के बाद मात्र 33 हजार वर्ग किलोमीटर का इंडिया मात्र रह गया।  जिसे गाँधी जी ने 'अपनी लाश पर होना कहा था...', जिसे नेहरू ने अपनी सत्ता भोग की लालसा के चलते 'नियति से मुलाकात कहा था' जिसे जिन्ना ने 'मात्र शुरूआत है...' कहकर भविष्य की योजना बता दी थी और जिसे हिंगलाज से ढाकेश्वरी तक के भक्तों ने, हिन्द की संतानों ने कहर की तरह झेला था..." उस जेहादी योजना की सफल परिणीति को लॉर्ड माउंटबेटन के ख़ुशामदिदो ने हमारी आगामी पीढ़ियों से छुपाने का षड्यंत्र भी आजादी के पश्चात रचा। अपने पाकिस्तान न जा पाने की मजबूरी को जिस मौलाना आजाद ने बार-बार भुनाकर वाहवाहियां लूटी और सत्ता भोगी उसी ने नेहरू और वामपंथियों के इशारों पर भारत के शिक्षा मंत्री रहते ...

महान हिन्दू संगठक-वीर महाराणा प्रताप

प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप सनातन धर्म व संस्कृति के रक्षक के रूप में एक ऐसा नाम जो युगों-युगों तक भारतवर्ष सहित विश्व के विभिन्न भागों में तब तक गूंजता रहेगा जब तक कि कोई भी व्यक्ति, सङ्गठन या देश अपनी राष्ट्रीय अस्मिता, धार्मिक स्वतंत्रता तथा स्वाभिमान की रक्षा व सम्मान हेतु लड़ता रहेगा।  भगवान श्री राम से भी पूर्व से चली आ रही सूर्यवंश की गौरवशाली क्षत्रिय परम्परा में विश्व के सबसे प्राचीन राज्य मेदपाट मेवाड़ जिसे पुरातन काल में चित्रकूट भी कहते थे उस चितौड़ की धरा के उज्ज्वल कीर्ति वाले राजवंश सिसोदिया कुल में जहाँ जन्मे महाराणा बप्पा रावल जिनके घोड़ों की टापों की गूंज आज भी हिंदुकुश के पर्वतों में आज भी गूंज रही है, जिनकी तलवार का स्वाद चखे म्लेच्छों के वंशज आज भी उनकी बसाई नगरी रावलपिंडी के नाम को बदलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए इन्ही के कुल में आगे महाराणा मोकल व कुम्भा, सांगा जैसे कुशल प्रजापालक, वीर व अद्वितीय योद्धा, महारानी पद्मावती व कर्मावती जैसी सती मातृशक्ति का प्रादुर्भाव हुआ। वहीं वीर प्रसूता माता जयवंती बाई की कोख से पिता महाराणा उदयसिंह जी के "प्रताप...

सत्ता मद के विरुद्ध जनसंघर्ष के नायक : भगवान परशुराम जी

वैदिक कालखंड के आर्यावर्त में हमारे ऋषि मुनि क्षत्रियों को राज सत्ता सौंप उन्हें राष्ट्र और जन दोनों के हित में कार्य करने का निर्देश दे कर आत्म निःश्रेयस भाव से वन में निवास करते हुए निरंतर समाज को देने के लिए नित्य नूतन ज्ञान-विज्ञान के अनुसंधान व तप में लीन रहते थे। इसी प्रकार के एक वैज्ञानिक महर्षि जमदग्नि के घर अक्षय तृतीया को बालक राम का जन्म हुआ। माता रेणुका के स्नेह छाँव में पोषित तथा परम् विद्वान पिता द्वारा प्रदत्त शिक्षा-दीक्षा से पल्लवित युवा राम कठोर तप हेतु हिमालय की गोद में चले गये, इधर सत्ता मद के अहंकार से ग्रसित राजाओं ने आम जनता सहित ऋषि-मुनियों को प्रताड़ित करना आरम्भ कर दिया।  ऐसे शासन में धर्म-कर्म, ज्ञान- विज्ञान के अनुसंधान में बाधाएं उतपन्न होने लगी, सनातन के आधार तत्व गाय, गंगा, गायत्री सभी असुरक्षित अनुभव करने लगे, मदांध राजसत्ता ऋषि गणों के अपमान और शील हरण पर उतर आई। महर्षि जमदग्नि ने नेतृत्व कर कठोर प्रतिकार किया परन्तु राजसी सत्ता ने उनके प्राणों की बली ले ली।  माता रेणुका, कामधेनु गौमाता की चीत्कार और आम जन की करूंण पुकार सुनकर विचलित राम तपस्या ...