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भारतीय ऋषि परम्परा के संवाहक : पण्डित दीनदयाल उपाध्याय

भारत भूमि ऋषियों और मनस्वियों की जन्मदात्री है, समय-समय पर यहाँ ऐसी मेधाएँ प्रकट हुई जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन देश और समाज के उत्थान व उन्नयन में समर्पित कर एक उच्च वैचारिक दर्शन हमें प्रदान किया, ऐसे ही महामनीषियों में से एक थे एकात्म मानवदर्शन के प्रतिपादक पण्डित दीनदयाल उपाध्याय।


आज पण्डित दीनदयाल जी का नाम और उनका वैचारिक दर्शन किसी परिचय से वंचित नही है, विगत 7 वर्षों से केंद्र में वर्तमान और पूर्व की भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए गठबंधन सरकारों ने केंद्र और राज्यों में जनकल्याण के, समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के लिए जितने भी काम किए उन सबमें उपाध्याय जी का एकात्म मानव दर्शन स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। अंत्योदय और गरीब कल्याण जैसी योजनाएं इसी का ही रूप है।

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी के माता-पिता श्री भगवती प्रसाद और माता रामप्यारी देवी मथुरा जिले के नगला चंद्रभान के मूल निवासी तथा अत्यंत ही साधारण परिवार से थे। दीनदयाल जी का जन्म दिनाँक 25 सितम्बर 1916 को उनके नाना श्री चुन्नीलाल शुक्ल के यहाँ राजस्थान के धानक्या (जयपुर-अजमेर रेल मार्ग) में हुआ। उनके नाना रेलवे में कार्यरत थे। जन्म से ही विधाता ने उनकी अग्नि परीक्षा लेना प्रारम्भ कर दिया था, जब वे मात्र ढाई वर्ष के थे उनके पिताजी का निधन हो गया, उनका व परिवार का लालन-पालन उनके ननिहाल में ही हुआ, दैवयोग की लीला की साढ़े छह वर्ष की वय में ही बालक 'दीनू' की माताजी संसार से विदा हो गई तथा कुछ समय बाद छोटा भाई शिबू भी नही रहा। ईश्वर अपने इस हीरे को आरम्भ से ही निखारना चाहता था इसलिए उसे विपदाओं की प्रखर ज्वाला में तपा कर परख रहा था।
नाना, मामा-मामी ने पूर्ण मनोयोग व लाड़ प्यार से दीनदयाल का लालन-पालन किया व अध्ययन की समुचित व्यवस्था की। आरम्भ से ही प्रतिभाशाली बालक दीनदयाल मेट्रिक में बोर्ड भर में प्रथम स्थान पर आये, ततपश्चात बिड़ला कॉलेज से इंटर, कानपुर से स्नातक व प्रयागराज (इलाहाबाद) से एल टी भी उच्च अंकों से उतीर्ण हुए।

1937 में कानपुर अध्ययन के दौरान उनका सम्पर्क वहाँ पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा लगाने वाले श्री भाऊराव देवरस से हुआ और वे उनके सानिध्य में स्वयंसेवक बन गए, यही से उनके जीवन में परिवर्तन शुरू हुआ तथा संघ विचार में स्वयं को आत्मसात कर उन्होनें अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रदेव की आराधना में आहूत करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। अपने मामा-मामी से अनुमति लेकर वो संघ के प्रचारक बन गए। 1942 में उन्हें लखीमपुर का जिला प्रचारक बनाया गया। ततपश्चात 1947 में वो उत्तरप्रदेश के सह प्रान्त प्रचारक नियुक्त हुए।

स्वतंत्रता पश्चात भारतीय राजनीति जिस प्रकार से दिग्भ्रमित हुई, उसमें भारतीयता का लोप होता हुआ दिखा तथा देश की स्वतंत्रता के महासमर में प्राणोत्सर्ग करने वाले अनगिनत योद्धाओं के दिव्य स्वप्नों पर जब कुठाराघात होने लगा, स्वतंत्रता गुलामी से बदतर होती दिखी तथा गाँधीजी के रामराज्य की कल्पना ध्वस्त होती नजर आने लगी तब स्वातन्त्र्य समर के एक योद्धा डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने नेहरूजी की सरकार से अपना त्यागपत्र देकर राजनीति की दशा और दिशा बदलने भगीरथ सङ्कल्प लिया। डॉ मुखर्जी अविचल हिन्दुत्वनिष्ठ तथा हिन्दू महासभा के अध्यक्ष थे, हिंदुत्व, राष्ट्रिय गौरवबोध, राष्ट्रीय संस्कृति, परम्परा और बहुसंख्यक समाज के अधिकारों का हनन होते देख तथा कश्मीर व बंगाल के हिंदुओं की दुर्दशा से बहुत विचलित हो गए थे। 

डॉ मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पुजनीय श्री माधवराव गोलवलकर जी (श्री गुरुजी) से भेंट कर इन विषयों पर लम्बी गहन चर्चा की तथा एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल के गठन की अपनी मंशा प्रकट की, चूंकि महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात संघ पर मिथ्या आरोप लगाकर उसे प्रतिबंधित कर श्री गुरुजी सहित अन्य शीर्ष नेतृत्व को जेल भेज दिया गया तब संघ के पक्ष में बोलने हेतु कोई राजनीतिक दल या मंच आगे नही आया, तब से एक राष्ट्रीय विचारों वाले राजनैतिक दल की आवश्यकता वरिष्ठ स्वयंसेवकों ने भी महसूस की थी फिर भी संघ प्रत्यक्ष राजनीति में अपनी भूमिका निभाने हेतु कतई उत्सुक नही रहा क्योकि संघ का मूल लक्ष्य राष्ट्र के सांस्कृतिक पुनरुत्थान का है जो सम्पूर्ण समाज को साथ लेकर ही सम्भव है। परन्तु श्री गुरुजी ने डॉ मुखर्जी के पवित्र मन्तव्य को समझकर पूर्ण सहयोग का विश्वास दिलाया।
डॉ मुखर्जी के नेतृत्व में 21 अक्टूबर 1951 को अखिल भारतीय जनसंघ की स्थापना की गई तब उनके सहयोग हेतु श्री गुरुजी ने कुछ वरिष्ठ स्वयंसेवकों को जनसंघ में कार्य करने हेतु अनुमति प्रदान की जिसमे प्रमुख थे पण्डित दीनदयाल उपाध्याय, उन्हें 1952 के कानपुर अधिवेशन में जनसंघ के अखिल भारतीय महामंत्री का दायित्व सौंपा गया। 1953 के कश्मीर आंदोलन के दौरान जब षड्यंत्रकारी परिस्थितियों में डॉ मुखर्जी का निधन हो गया तब जनसंघ की सम्पूर्ण जिम्मेदारी उपाध्याय जी के कंधों पर आ गई वो ही इसके विचारक, संगठक व प्रचारक थे, इस नए दल की संगठनात्मक व वैचारिक जड़े जमाने का महत्वपूर्ण कार्य दीनदयाल जी ने पूर्ण मनोयोग से किया।

किसी भी सङ्गठन का मूल आधार उसकी विचारधारा होती है विशेष रूप से राजनीतिक दल की तो छवि भी इसी से निर्मित होती है। दीनदयाल जी स्वयंसेवक थे वो अक्सर कहते थे कि "हमारी राष्ट्रीयता का आधार 'भारत माता' है, केवल भारत नहीं। माता शब्द हटा दीजिए तो भारत केवल जमीन का एक टूकड़ा रह जायेगा" । इसलिए जनसंघ के वैचारिक अधिष्ठान में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की के पवित्र ध्येय को समाहित कर राजनीति व सत्तानीति के बजाय राष्ट्रनीति को प्रधानता दी, उसी को आधार बना राजनीति, समाजनीति व अर्थनीति के सिद्धांतों व नीतियों का निर्धारण किया। यह उनका वैशिष्ट्य था कि इसमें उन्होंने भारतवर्ष के प्राचीन गौरव, संस्कृति व जीवन मूल्यों को अक्षुण्ण रखते हुए समय के साथ परिवर्तनशीलता को भी स्थान दिया।
उनका कहना था कि - "हमारा कार्य व्यक्तिगत हो या सामाजिक, उसका आधार जब तक धर्म नही बन जाता तब तक न तो मनुष्य की मूल प्रवृत्ति में परिवर्तन होगा और न ही समाज की आवश्यकताओं व आकांक्षाओं में सामंजस्य निर्माण होगा"।

उन्होंने जनसंघ को एक सुदृढ सांस्कृतिक, वैचारिक आधार तथा आर्थिक, सामाजिक नीतियाँ व संगठनात्मक सूत्र प्रदान किए। यह उनके दृढ़ निश्चय व अनवरत परिश्रम का ही परिणाम था की जनसंघ को सम्पूर्ण देश में सामाजिक व राजनैतिक मान्यता मिली,भारत के अधिकांश राज्यों में जनसंघ का सुदृढ सङ्गठन खड़ा हुआ, विभिन्न चुनावों में यथेष्ठ सफलता प्राप्त की तथा भारतीय राजनयिक धरातल पर जनसंघ एक मजबूत विपक्षी दल के रूप में उभरा। दीनदयाल जी विपक्ष की एकता के पक्षधर थे उनका मानना था कि कॉंग्रेस की जनविरोधी नीतियों तथा कम्युनिस्टों की देश तोड़क गतिविधियों को कड़ा उत्तर देना सत्ता की राजनीति से कही अधिक महत्वपूर्ण है, इसके लिए एकजुट विपक्ष आवश्यक है लेकिन वो भी अपने वैचारिक आधार पर खड़े रहकर तथा अपने दलीय प्रजातंत्र को सुरक्षित रखते हुए।  उनके मार्गदर्शन में किए गए विभिन्न आंदोलनों ने सत्ता पक्ष की नींद उड़ा दी थी क्योकि जनमानस का अभूतपूर्व समर्थन जनसंघ को सम्पूर्ण देश में मिल रहा था। संसद से लेकर कई राज्यों की विधानसभाओं में जनसंघ के चुने हुए जनप्रतिनिधि लोकतांत्रिक दायित्वों को बखूबी निभाते हुए जनता की आवाज बने हुए थे। 1967 में हुए चौथें महानिर्वाचन व विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव  परिणामों के बाद कॉंग्रेस कई राज्यों की सत्ता से बाहर हो गई और जनसंघ सहित विपक्षी गठजोड की संविद सरकारें गठित हुई, यह भारत की राजनीति में एक सुखद अध्याय का शुभारंभ था।

1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय तथा उसके विघटन के पश्चात जब 1980 में भारतीय जनता पार्टी नाम से नए राजनीतिक दल का निर्माण अटल जी के नेतृत्व में पूर्व के जनसंघियों ने किया तब भी दल के वैचारिक अधिष्ठान के रूप में दीनदयाल जी द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानव दर्शन व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को ही प्रमुखता दी गई।

उनका राजनीति जीवन एक परिव्राजक जैसा था, उनका चिंतन उच्चकोटि का तथा उनकी कार्यशैली सहज और शालीनता युक्त थी, उनका सरल व सादगीपूर्ण जीवन लोगों को अपनी ओर खींचता था, उनका स्नेहपूर्ण व्यवहार कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचरण करता था, उनकी उपस्थिति सकारात्मक वातावरण का निर्माण करती थी, भारतीय राजनीति के कई विलक्षण नेतृत्व उनकी कार्यशैली की ही देन है।
उनका अध्ययन व लेखन उनकी ऋषि तुल्य मेधा का प्रत्यक्ष प्रमाण है, उन्होंने उत्तरप्रदेश के सह प्रान्त प्रचारक रहते हुए राष्ट्रधर्म प्रकाशन द्वारा प्रकाशित राष्ट्रधर्म मासिक, पाञ्चजन्य साप्ताहिक व दैनिक स्वदेश का सम्पादन कार्य भी किया, उनकी लिखित पुस्तके 'सम्राट चन्द्रगुप्त' व 'आद्य शंकराचार्य की जीवनी' युवाओं हेतु प्रेरणास्पद है।

भारत ही नही आज विश्व भी उनके द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद को स्वीकार करता है, वो भारत की ऋषि परम्परा के संवाहक थे, भारत उनके प्राणों में बसता था और भारत के लोग उनकी आत्मा थे। बाल्यकाल से ही कठिन परिस्थितियों में निखरे और अभावों को साथ लेकर जीने वाले दीनदयाल जी का व्यक्तिगत अनुभव ही एकात्म मानव दर्शन के रूप में प्रकट हुआ है। उनका स्पष्ट विचार था कि पश्चिमी जगत के पूंजीवाद और समाजवाद से भारतीय समाज का क्या लेना-देना? जिस व्यवस्था में भारतीय संस्कृति और परम्परा लुप्त हो, जिसमें भारतीय जीवन मूल्यों की उपेक्षा हो उसे इस देश के आर्थिक व सामाजिक परिवर्तन हेतु लागू करना केवल अंधी नकल है इसमें किसी का भी हित समाहित नही है।

उनके द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानव दर्शन की स्पष्ट मान्यता है कि मनुष्य शरीर, मन बुद्धि और आत्मा का संकलित रूप है। इसलिए मानव का सर्वांगीण विचार उसके संकलित रूप का विचार है, उसके व्यक्तित्व के इन चारों पक्षों की आवश्यकताओं, मांगों व इच्छा आकांक्षाओं को पूर्ण करने हेतु भारतीय संस्कृति में चार पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का आदर्श है जो व्यक्ति के विकास, भौतिक प्रगति व नैतिक-आध्यात्मिक उन्नति को प्रशस्त करते है। यही धारणा समाज की भी होती है, उसका भी व्यक्तित्व होता है, उसके भी पुरुषार्थ होते है, मानव व समाज की यही परस्पर एकात्मता ही व्यष्टि और समष्टि के समग्र विकास का आधार है, मनुष्य यंत्र मात्र नही है जिन व्यवस्थाओं ने इसे यंत्र समझा वो अधूरी व्यवस्था है जो भारतीय संस्कृति व चिंतन के अनुकूल नही है। उपाध्याय जी का मानना था कि मानव का इस प्रकार समग्र व समन्वित विचार करते हुए जीवन के सभी अंगों का और व्यवस्थाओं का विचार कर संरचना की जाए तो सम्भवतः राष्ट्रीयता, मानवता, विश्व-शांति आदि श्रेष्ठ आदर्शों की दिशा में अंतर्विरोध समाप्त होकर  वे एक दूसरे के पूरक बनेंगे और मानव उद्देश्यपूर्ण सुखी जीवन प्राप्त करेगा तथा एकात्म मानव दर्शन साकार होगा। मुंबई की एक व्याख्यानमाला में दिए गए अपने उद्बोधन में पण्डित दीनदयाल जी कहते है " हम लोग राष्ट्र को बलशाली, समृद्ध और सुखी बनाने के संकल्प को लेकर चले है। इसलिए इस वैचारिक अधिष्ठान पर हमें राष्ट्र की पुनर्रचना का कार्य करना है, हमें एक ऐसा भारत बनाना है जो हमारे पूर्वजों के भारत से भी अधिक गौरवशाली हो और यहां जन्मा प्रत्येक मनुष्य अपने-अपने व्यक्तित्व का विकास करते हुए केवल सम्पूर्ण मानव जाति के साथ ही नही, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि के साथ एकात्मता का साक्षात्कार करता हुआ नर से नारायण बनने हेतु समर्थ हो।

दिसम्बर 1967 में जनसंघ के कालीकट अधिवेशन में उन्हें दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। इस दायित्व को ग्रहण कर वे लंबे समय तक सबका मार्गदर्शन करते यह शायद होनी को स्वीकार नही था, महान आत्माओं का इस धरा पर पड़ाव अल्प ही होता है। 11 फरवरी 1968 को लखनऊ से पटना प्रवास पर जाते समय रास्ते में किसी राष्ट्रद्रोही द्वारा उनकी हत्या कर दी गई, उनकी मृत देह मुगलसराय (अब दीनदयाल उपाध्याय ) रेलवे स्टेशन की पटरियों पर पड़ी मिली। संघ के एक आदर्श स्वयंसेवक जो इतने बड़े दायित्व पर होते हुए भी प्रतिदिन संघ प्रार्थना करने का अपना वचन कभी नही भूले, एक ऐसे निस्पृह, निर्लिप्त व्यक्तित्व जो राजनीति में नही जाना चाहते थे किंतु एक सच्चे स्वयंसेवक की भांति प.पु. श्री गुरुजी की आज्ञा शिरोधार्य कर उसमे गए परन्तु राजनीति को भी उन्होंने संघ कार्य ही माना। साधारण धोती-कुर्ता, पांवों में चप्पल और कंधे पर कपड़े का झोला लटकाए वो महामनीषी जिनके झोले में संघ की नेकर ही एकमात्र स्थायी सम्पत्ति थी भारत के उज्ज्वल भविष्य थे परन्तु विधि को यह स्वीकार नहीं था। उनके इस आकस्मिक बिछोह पर पथ के साथी रहे और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री भारत-रत्न स्व. अटलबिहारी वाजपेयी जी ने अपनी श्रद्धांजलि देते हुए भावुक शब्दों में कहा था -
" नन्दा दीप बुझ गया, हमें अपने जीवन -दीप जलाकर अंधकार से लड़ना होगा। सूरज छिप गया, हमें तारों की छाया में अपना मार्ग ढूंढना होगा"।

वो कभी संसद के किसी भी सदन के सदस्य नही रहे परन्तु उनके सम्मान में भारत की संसद में उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। भारत की तत्कालीन विशिष्ट हस्तियों ने उनके निधन को राष्ट्र की अपूर्णीय क्षति बताया। आज वो नही है लेकिन उनके विचार, सङ्गठन कौशल तथा उनके द्वारा प्रस्थापित वैचारिक एकात्म मानव दर्शन भारत और भारतीय राजनीति को सदैव प्रेरणा देते रहेंगे।
कवि पण्डित नरेन्द्र मिश्र की यह पंक्तियाँ उनपर एकदम खरी उतरती है।

वह वीर विजेता कालजयी, अविराम चेतना छोड़ गया।
यश की सम्पूर्ण विरासत से भारत का नाता जोड़ गया।।
युग-युग कविता की वाणी में जिसका यश गाया जायेगा।
आने वाला इतिहास सदा उसकी महिमा दोहरायेगा ।।

✒️©️ नरेश बोहरा "नरेंद्र"
         नाड़ोल (राजस्थान)

Comments

  1. शानदार भाई साहब जी

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  2. अपने आप में संपूर्ण दीनदयाल जी की जीवनी का शिलालेख है यह आपने बहुत सुंदर शब्दों हर भाव को चंदन कर डाला

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