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पर्युषण और क्षमापना पर्व सम्वत्सरी

सनातन धर्म व संस्कृति में शरीर और आत्म शुद्धि हेतु पवित्रता पर विशेष बल दिया गया है, बाहरी पवित्रता देह की होती है तथा आंतरिक पवित्रता मन की , इसके लिये महर्षि पतञ्जलि ने योगदर्शन में योग को  "योगश्चितवृतिनिरोधः" कह परिभाषित किया है। 

सनातन के प्रमुख अंग जैन मत में भी इसे स्वीकार किया गया तथा देह व आत्मशुद्धि हेतु तपस्या पर विशेष बल दिया गया, यह तपस्या वास्तव में अष्टांग योग के यम-नियम की पालना ही है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह यम है तथा पवित्रता, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणिधान नियम है। चातुर्मास काल मे आने वाला आठ दिवसीय पर्युषण पर्व मूलतः तपस्या का ही पर्व है , तपस्या अर्थात मन और इंद्रियों का संयम करते हुए धर्म का पालन करना तथा उसके लिए कष्ट सहन करना और तितिक्षा एवं व्रतादि का नाम ही तपस्या है। 

आचार्य गुरु भगवन्तों के पावन सानिध्य में मुमुक्षु भाव से तपस्या रत होकर जीवात्मा को दोष रहित बनाकर, उसे कर्म के कषाय से मुक्त करना ही साधक का प्रमुख कर्तव्य है। आत्मा के भीतरी कलुष परिणाम को कषाय कहते हैं। क्रोध, मान, माया, लोभ, ये चार ही कषाय प्रसिद्ध हैं। जीवात्मा तपस्या द्वारा इससे मुक्त होकर कैवल्य को प्राप्त हो सकती है यह कैवल्य ही मोक्ष है। अजैन मत में मोक्ष मृत्यु पश्चात आत्मा का विषय है, जैन मत में यह इसी देह से सम्भव है। पर्वाधिराज पर्युषण की तपस्या की निवृत्ति का दिवस संवत्सरी कहलाता है। गुरु के सानिध्य में कई गई तपस्या ही व्यक्ति के हृदय में विनय को जन्म देती है और यह विनम्रता ही उसे अपने द्वारा मन-वचन-कर्म से किये गए किसी के प्रति दुर्व्यवहार व ज्ञात अज्ञात पापों की ग्लानि का अहसास करवाती है और वो याचक भाव से चराचर जगत से क्षमा याचना करता है, यही क्षमापना पर्व सम्वत्सरी का मूल उद्देश्य है। 

भगवान महावीर की अहिंसा वीरोचित अहिंसा है उसमें कायरता का प्रलाप नही है, इसी अहिंसा पर राष्ट्रकवि दिनकर जी ने लिखा था-

 " क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो,

       उसे क्या जो विनीत, विषहीन सरल हो।"

सामर्थ्यवान ही क्षमादान का अधिकारी है, असमर्थ क्या क्षमा करेगा, वो तो स्वयं दया का पात्र है। 

जैन दर्शन में क्षमापना व अनेकान्तवाद का सिद्धांत अद्भुत है, यह आपसी मतभेदों को दूर करता है, सभी विचारों का सम्मान करता है। अहंकार का शमन करता है तथा मानव-मानव में प्रेम का भाव जगाता है। यह मूलतः हमारे वेदों का ही सार रूप है। 

आप सभी से मिच्छयामि दुक्कड़म के साथ |जय जिनेन्द्र|

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✒️©️ नरेश बोहरा " नरेन्द्र" 

नाड़ोल (राजस्थान)

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