विषय आज के अफगानिस्तान का है......
गौतम बुद्ध द्वारा प्रतिपादित अहिंसा हाथ बांधकर बन्दूक की नोक पर मौन बैठी है। शान्ति दूर किसी कोने में मृतप्रायः पड़ी है तथा आतंक अट्ठहास कर रहा है।
तथागत के महानिर्वाण के बाद दिग्भ्रमित बौद्ध भिक्षुओं और अनुयायियों ने आर्यभूमि की तलवार की धार को भोथरा कर दिया। बड़े-बड़े वीर सम्राटों को क्षात्र धर्म से च्युत कर भिक्षु की भूमिका में बदल दिया।
परिणाम..... भारत भूमि पर जो वीरता और अखंडता का भाव चाणक्य ने जनमानस में प्रकट कर इसकी सुरक्षा सुदृढ की थी वो दीवार दरक गई। शांति और अहिंसा कायरता में परिणित हो गई। पूज्य आद्य शंकराचार्य जी ने दैहिक भोगविलास में डूबे बौद्ध भिक्षुओं को शास्त्रात में पराजित कर उन्हें पुनः वैदिक परंपरा में समाहित किया। भारत के बाहर यह मत स्वीकृत इसलिए हुआ क्योंकि उन लोगों के मूल में कोई स्थापित संस्कृति के कोई अंश नही थे उन्हें यह सुगम लगा और पूर्णता की खोज का परिणाम समझ इसे आत्मसात किया।
कनिष्क का उपगणस्थान भी बौद्ध मतावलंबियों का क्षेत्र रहा है, पर उसके मूल में सनातन वैदिक धर्म स्पष्ट था। शक कनिष्क भारत के महानतम राजाओं में प्रतिष्ठित है।
बाद के बौद्धों ने भारत के उस द्वार से आने वाले आक्रांताओं को रोकने की कोई कोशिश नही की अपितु उन्हें सहूलियते प्रदान की....परिणामस्वरूप भारत पर उस रास्ते से लुटेरे निरन्तर आने लगे।
सिंध सम्राट दाहिर सेन से आंतरिक घात बौद्धों ने किया और बिन कासिम के कदम यहाँ पड़े।
आज का अफगानिस्तान शरिया कानून के अंतर्गत कड़ाई से चलने वाले तालिबानी इस्लामिक जेहादियों की पूर्ण गिरफ्त में है। मरने और मारने वाले दोनों खुदा के बन्दे ही है, पर यह लिबरल और कट्टरता की लड़ाई है जो इस्लाम में जायज है। इस्लाम के आरम्भिक काल में अरबी कबीलों में इस प्रकार की जंग बहुत बार हुई जिसमे आमने-सामने मुसलमान ही थे। कर्बला की लड़ाई भी इसी हेतु से हुई थी।
विश्व में कही पर भी सेक्युलरिज्म की मानसिकता का इस्लामिक स्टेट मज़हब की मूल मान्यताओं के विरुद्ध है, तुर्की के शासक कमाल पाशा का सहिष्णु व्यवहार तुर्की की प्रगति में महत्वपूर्ण रहा पर उसे कभी इस्लामिक धार्मिक दृष्टिकोण से मान्य नही किया गया।
शरीयत मतलब शरीयत....कोई समझौता नही...।
अफगानिस्तान की समस्या चिंतनीय है, पर उससे भी कही अधिक विचारणीय पहलू यह है कि भारत में जो अपने आपको मानवाधिकार वादी, बात बात में "...भारत में अब डर लगता है..." कहने वाले लिब्राण्डू, सेक्युलरिज्म के ठेकेदार, अवॉर्ड वापसी गैंग, असहिष्णुता बढ़ती देखने वाले वामपंथी बुद्धिजीवी आदि चुप है उन्हें वहाँ की खतरनाक होती स्थिति, मानवाधिकारों का हनन, महिला अत्याचार और पलायन को ये न देख पा रहे है और न कुछ बोल रहे है। उनको साँप सूंघ गया लगता है।
जरा सी बात पर हिन्दू धर्म छोड़कर मुसलमान बन जाने की धमकी दिलाने वाले नकली दलित हितचिंतक, स्वयं को नवबौद्ध कहने वाले नकली अम्बेडकरवादी, जय-भीम जय-मीम का नारा लगाने वाले बामसेफिया पिछलग्गू आज गौतम बुद्ध की धरती पर हो रहे जेहादी आतंकवाद पर मौन है, बुद्ध प्रतिमाओं के अपमान पर चुप है, क्यों....? ऐसा कौनसा भाईचारा है जो बोला ही नही जाता, वो बामियान के हमलों पर भी कुछ नही बोले थे और न कभी पाकिस्तान में हिन्दू भाइयों जो कि अधिकांश इनके मतानुसार दलित है पर होते अत्याचारों पर कुछ बोलते है यह ज्यादा खतरनाक है। बात-बात पर केन्द्र सरकार को कोसने वाले अब शुतुरमुर्ग की स्थिति में बैठे दिखाई दे रहे है।
सनातन धर्म में कभी अनीति, अत्याचार और अतिवादी विचारों को प्रश्रय नही दिया गया,महिलाओं, बच्चों पर हिंसा को सम्मान नही मिला। उल्टे उन्हें असुर कहकर समाज की मुख्यधारा से अलग किया गया तथा धर्मानुसार उन्हें उनके पापों का दंड भी दिया गया।
हिन्दू धर्म कभी भी हिरण्यकश्यप, महिषासुर, रावण, कंस, दुर्योधन जैसे आसुरी प्रवृतियों वाले व्यक्तियों की पूजा नही करता अपितु उनका संहार कर उनके ऊपर विजय प्राप्त करने वालों का यशोगान करता है, उन्हें भगवान की पदवी प्रदान करता है।
आजकल वामपंथी लाल लंगूरों व तथाकथित नारीमुक्ति के ठेकेदारों ने दुष्प्रचार भावना से वशीभूत हो भारत भूमि पर हिरण्यकश्यप, महिषासुर, रावण, होलिका जैसे पौराणिक राक्षसों को महिमामण्डित करने का अभियान चलाया हुआ है, तथा हमारे सीधे सादे लोगों को इसका शिकार बनाया जा रहा है, जिससे सावधान रहने की जरूरत है।
आसुरी शक्तियों के अराजक तालिबान का समूल नाश आज से समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है और पूर्ण विश्वास है कि इस धर्मयुद्ध का नेतृत्व भी भारतवर्ष की पवित्र धरती से ही होगा, हम सब अपने धर्म और संस्कारों पर अटल रहकर तथा वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति पर विश्वास रखकर इस महासमर में सहभागिता रख सकते है।
शास्त्र भी यही कहते है "धर्मो रक्षति रक्षितः"
@ नरेश बोहरा 'नरेन्द्र' (नाड़ोल)
समसायिकी पर एकदम सटीक प्रहार हैं शान्तिदूतों और लाल लंगुरों की भड़वापन्ती पर
ReplyDeleteएकदम सटीक विश्लेषण किया है राजा जब अहिसंक हो जाये तो प्रजा नपुंसक हो जाती है
ReplyDeleteयही तो हो रहा है अफगान में यह भी हुआ भारतवर्ष में
इसलिए लोकतंत्र के भरोसे हम तो शायद 70-80 वर्ष सुरक्षित रह जाये लेकिन आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित नही होगी मुकाबला करना ही होगा
इसलिए इस बर्बर कौम से निपटने के लिए हमारी नस्लो में उपस्थित रुद्र को जगाना होगा
बहुत अच्छा एवं सटीक विश्लेषण
ReplyDeleteबोधात्मक ब्लॉग।
ReplyDeleteआपके विश्लेषण परफेक्ट हैं भाईसाहब
ReplyDeleteधन्यवाद आप सभी का
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