राजनीति में हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रस्तोता सावरकर जी सेक्युलरिज्म के ठेकेदारों को हजम नही हुए तो डॉ आंबेडकर जी जाती श्रेष्ठता के झंडाबरदारों को..।
मध्यप्रदेश के महुँ में सूबेदार श्री रामजी सकपाल और भीमाबाई के घर बालक भीमराव का जन्म 14 अप्रैल 1891 को हुआ। अध्ययन में आ रही जातीय बाध्यता के कारण विद्यालय के ब्राह्मण शिक्षक केशव जी अम्बेडकर ने बालक भीमराव को अपना उपनाम प्रदान कर उन्हें पढ़ने का अवसर दिया। बचपन से अध्ययन प्रिय, मेधावी और कठोर परिश्रमी छात्र भीमराव ने 1912 में बीए करने के बाद बड़ौदा महाराज सयाजीराव गायकवाड़ द्वारा प्रदत्त छात्रवृत्ति से अमेरिका जाकर एम.ए. किया। 1916 में पीएचडी की तथा 1920 से 1923 तक लंदन में कानून की पढ़ाई कर भारत लौटे और वकालत आरम्भ की।
भारत लौटने पर डॉ आंबेडकर ने भारतीय समाज में व्याप्त अश्पृश्यता का वातावरण देख पीड़ा का अनुभव किया तथा अपना जीवन उसके निर्मूलन हेतु लगा दिया। गाँवों में तालाब से पानी तक नही पीने देने का विरोध करते हुए उन्होंने 1926 में महाड़ तालाब पर जल सत्याग्रह तथा मन्दिर प्रवेश को लेकर 1930 में नासिक के प्रसिद्ध कालेराम मन्दिर में दलितों के प्रवेश हेतु आंदोलन किया। अपेक्षित सफलता न मिलने पर डॉ आंबेडकर ने अश्पृश्यता की समस्या पर गम्भीर चिंतन करना प्रारंभ किया तथा जो उन्होंने अपने जीवन में झेला उसे भी याद रख वंचित समाज को अपनी स्वयं की पवित्रता बनाये रखने, शिक्षा को अपनाने तथा संगठित होकर अधिकारों हेतु संघर्ष की प्रेरणा दी। राजनीति में सक्रिय होकर उन्होंने समय-समय पर अंग्रेजी प्रतिनिधिमंडल, गोलमेज सम्मेलनों तथा अन्य मंचो पर दलितों को समान अधिकार देने की मांग की। हिन्दू समाज की जाती व्यवस्था का विरोधकर उन्होंने हिन्दुत्व के व्यापक रूप की अवधारणा को समझाया। 1935 में पृथक दलित निर्वाचन क्षेत्र की उनकी जोरदार मांग के कारण तत्कालीन कॉंग्रेस नेतृत्व सकते में आ गया तथा महात्मा गांधी को आगे कर डॉ आंबेडकर जी से समझौता किया। 1935 में ही उन्होंने हिन्दू धर्म को त्यागने की घोषणा की जिसके फलस्वरूप निजाम हैदराबाद और अंग्रेजों ने उनको इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने हेतु प्रलोभन देने का प्रयास किया जिसे उन्होंने राष्ट्र को खतरा कह कर ठुकरा दिया। अपनी अध्ययनशील व लेखन की प्रवृत्ति के कारण उन्होंने कितनी ही पुस्तके लिखी तथा अखबार भी निकाले। अर्थशास्त्र में पारंगत डॉ अम्बेडकर ने "प्रॉब्लम ऑफ रुपिज" पुस्तक लिख कर भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना का आधार तैयार किया। संविधान सभा के सदस्य चुने जाने पर उन्होनें इसका दलितों के हित में आवाज उठाने हेतु अवसर समझकर देश के करोड़ों वंचितों को लाभ दिलाने का निर्णय किया। यह उनकी विद्वत्ता का ही परिणाम था कि उन्हें संविधान की प्रारूप लेखन समिति का अध्यक्ष चुना गया और इस दायित्व का निर्वहन करए हुए उन्होंने विश्व के 22 से भी अधिक देशों के संविधान का अध्ययन कर भारतीय संविधान का ड्राफ्ट तैयार किया जिसे संविधान सभा ने हृदय से स्वीकार किया। उन्होनें भारत विभाजन का भी पुरजोर विरोध करते हुए इस्लामिक जेहादी इतिहास से हमारे नेतृत्व को परिचित करवाया तथा विभाजन में जनसंख्या का पूर्ण बंटवारे का समर्थन किया। मुसलमानों के बारे में उनकी स्पष्ट धारणा थी कि वो धर्म के आगे कीसी राष्ट्र की अवधारणा को नही मानते है। उनके यह विचार "पार्टीशन ऑफ इंडिया ओर पाकिस्तान" पुस्तक से पढ़ सकते है। शूद्रों की उतपत्ति तथा आर्यों के मूल स्थान के बारे में उनका स्पष्ट मत था कि आर्य मूल भारतीय ही है आर्य कोई जाति नही केवल गुणवाचक शब्द है। शुद्र भी हिन्दू ही है इस्लामिक आक्रमणकारियों द्वारा परिजित हिंदुओं से अपवित्र कार्य करवा कर उन्होंने हिन्दुओं में बड़ा विभाजन किया जो लगातार सैकड़ो वर्षों के आक्रमणों के काल चक्र के कारण स्थायी हो गया तथा समाज में खाई बढ़ती गई। "हू आर शुद्र" पुस्तक में इन्होंने इसकी गहरी विवेचना की है। दलितों व वनवासियों को मुख्यधारा में लाने हेतु उन्होंने संविधान में उनके लिए आरक्षण का प्रावधन रखा। हिन्दू कोड बिल के माध्यम से हिन्दू समाज की गलत परम्पराओं का उन्होंने खंडन किया तथा महिलाओं व श्रमिकों के उत्थान हेतु अनेकों कानून बनाए। अनुच्छेद 370 पर उनका मत स्पष्ट था कि यह विभाजनकारी है। कम्युनिस्टों को वो देश के लिए सदैव खतरा समझते थे उनका मानना था कि जो धर्म को अफीम समझते हो वो एक धर्म प्राण देश के लिए हितकारी कैसे हो सकते है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं व शिविरों में जाकर उन्हें असीम संतुष्टि मिलती थी कि ये लोग ही जातीय भेदभाव दूर कर सकते है। उन्होंने हिन्दू धर्म को त्यागने की जो घोषणा 1935 में की थी उसे 21 वर्ष बाद पूर्ण कर भारतीय दर्शन के अंतर्गत आने वाले बुद्ध धर्म को 1956 में अपनाया। भारतीय राजनीतिक और सामाजिक जीवन के इस दैदीप्यमान दीपक का अवसान 6 दिसम्बर 1956 को हुआ।
आज देश में बाबा साहेब अंबेडकर जी के विचारों में मिलावट कर अनेकों व्यक्ति औऱ सङ्गठन देश को तोड़ने व सामाजिक सद्भाव समरसता को समाप्त करने पर तुले हुए है, जिन कम्युनिस्टों को बाबा साहेब ने भारतीय समाज का शत्रु बताया था वो कम्युनिस्ट आज खुद को अम्बेडकर वादी कहकर भोले भाले लोगों को बरगला रहे है। उन्हें हिन्दू धर्म के विरुद्ध भड़का रहे है, देवी देवताओं के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग हो रहा है। दलितों व शेष हिंदुओं में खाई को चौड़ा कर मूलनिवासी व बाहरी का वितण्डा खड़ा कर रहे है। बाबा साहेब के मूल विचारों को विस्मृत कर नकली देशविरोधी प्रोपगेंडा चलाया जा रहा है। इस्लामिक मानसिकता को स्पष्ट परिभाषित कर चुके बाबा साहेब के विचारों व आलेखों को दबाकर जय भीम-जय मीम का नारा लगा कर साम्प्रदायिक सामाजिक धुर्वीकरण कर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। आज देश में बाबा साहेब के सच्चे अनुयायियों के स्थान पर ढोंगी और विदेशी षड्यंत्रकारियों की शह पर खड़े देश तोड़ने की मंशा रखने वाले चंद्रशेखर रावण, वामन मेश्राम, उदितराज आदि लोग प्रसिद्ध हो रहे है, बामसेफ जैसे विखंडनकारी सङ्गठन समाज में विभेद बढाकर समरसता को समाप्त करने पर तुले है। आज उनकी पावन जन्म जयन्ति के अवसर पर हमें यह सङ्कल्प लेना है कि देश और समाज में बाबा साहब के वास्तविक विचार व भावनाओं का प्रचार करेंगे व विरोधी ताकतों को मुंहतोड़ उत्तर देंगे।
जय भीम-जय भारत।
@ नरेश बोहरा "नरेन्द्र" (नाड़ोल)
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आपकी वैचारिक और तार्किक बुद्धिमता को नमन।
ReplyDeleteधन्यवाद सा
Deleteबातें सामने आनी चाहिए।
ReplyDeleteहाँ , जीजी सा
ReplyDeleteज्ञान आलोक को प्रचारित करने वाली लेखनी को सादर प्रणाम ।
ReplyDeleteसादर धन्यवाद
Deleteबहुत ही शानदार
ReplyDeleteबाबा साहब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर पर आपका लेख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रिय कार्यवाह श्री हनुमान सिंह जी भाई साहब के आज के पाथेय की तरह हुबहु.... जैसे आप आज नाडोल नही बल्कि भीनमाल गायत्री मंदिर में उनका पाथेय श्रवण कर आलेख लिख रहे हो.....
मेरा अहोभाग्य
ReplyDeleteअति सुन्दर । भाई साब । So nice
ReplyDeleteसटीक विश्लेषण भाईसाहब
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