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भगवान आद्य शंकराचार्य जी विशेष

ऐसे समय में जब इस धरा पर सनातन वैदिक धर्म को नष्ट करने के उद्देश्य से बौद्धों, कापालिकों और उनके समर्थकों ने वेदों, मंदिरों, संस्कृति व परम्पराओं को नष्टभृष्ट करना आरम्भ कर दिया था, राजसत्ता उनके अंधप्रभाव में अपने शास्त्रीय ज्ञान व शस्त्र की धार को कुंद कर चुकी थी, चारों तरफ हाहाकार था, धर्मज्ञ लोग संस्कृति और प्राण बचाने हेतु ईश्वर को पुकार रहे थे, ढाई हजार वर्ष पूर्व दक्षिण भारत के केरल में एक वेदपाठी ब्राह्मण के घर में स्वयं महाकाल ने शिवांश स्वरूप भगवान शंकराचार्य के नाम से जन्म लिया। 7 वर्ष की आयु में सन्यास एवं 32 वर्ष में महाप्रयाण के बीच के कालखण्ड में उन्होंने सम्पूर्ण आर्यभूमि में वैदिक धर्म का पुनरुद्धार व पुनर्प्रतिष्ठा का महान कार्य किया। अपने दिव्य वैदिक ज्ञान के बल पर उन्होंने धर्मच्युत समाज को एक नई दिशा प्रदान की और धर्मविरिधियों को पराजित कर उन्हें पुनः सनातनी बनाया। प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद भगवान शंकराचार्य जी ने जी कार्य सम्पन्न किये उनका वर्णन यह लेखनी और चर्म जिव्हा करने में असमर्थ है। हम वैदिक धर्मावलम्बी आपके सदैव ऋणी रहेंगे। वो सनातन के अक्षय प्रकाश स्तम्भ है, ...
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ईसायत के मकड़जाल में पंजाब

 पंजाब में 65000 पादरी है , जिस चर्च के 14 साल पहले सिर्फ  3 मेंबर थे -वो अब है तिन लाख 300000 सदस्य: पंज प्यारों की जमीन पर ‘पगड़ी वाले ईसाइयों’ की छाया कैसे.....सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंज प्यारों की जमीन पर देखते-देखते ही कैसे 'पगड़ी वाले ईसाई' छा गए। इस सवाल का जवाब देने में जितनी देरी होगी, धर्मांतरण माफिया की जड़ें उतनी ही मजबूत होती जाएगी। भारत धर्मांतरण (Religious Conversion) के घातक जाल में उलझा हुआ है। भोले-भाले जनजातीय समाज के लोगों को प्रलोभन दे ईसाई बनाने से मिशनरियों ने इस घातक जाल के धागे जोड़ने शुरू किए। अब यह एक ऐसे जाल के रूप में सामने आ चुका है, जिसमें दलित, पिछड़े, सर्वण… सब उलझे नजर आ रहे हैं। इस घातक जाल की जद में पंजाब (Religious Conversion In Punjab) भी है। इंडिया टुडे मैगजीन ने पंजाब में ईसाई धर्मांतरण पर कवर स्टोरी की है। इससे जो तथ्य सामने आए हैं, वे बताते हैं कि यदि इस पर लगाम न लगी तो परिणाम घातक हो सकते हैं।       साल 2022 की शुरुआत में जब पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए, तब यहाँ की आबादी का एक ऐसा वर्ग चर्चा में था जो खुद क...

बजरंगदल-देश का बल

  #बजरंग_दल_स्थापना_दिवस बात 1989 की है, मेरे गाँव नाड़ोल में अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर निर्माण हेतु आरम्भ हुई श्रीराम शिला पूजन रथयात्रा का आगमन हुआ, सभी वरिष्ठ लोग वहाँ व्यवस्था में लगे हुए थे, हम बाल स्वयंसेवकों की टोली भी वहाँ यथायोग्य गिलहरी समर्पण करने हेतु अग्रपंक्ति में उपस्थित थी। यथा समय रथयात्रा का आगमन हुआ, पूजन व पूज्य संतो का उद्बोधन हुआ, जय श्री राम के गगनभेदी उद्घोष में हम भी पूर्ण सहयोगी बने। रथयात्रा के साथ बजरंग दल के तरूणों की एक टोली भी थी जो व्यवस्था संभालने व त्वरित कार्यवाही हेतु सचेत दृष्टि से नियुक्त थी, उनके कन्धों पर सुशोभित हो रहा   "बजरंग दल राजस्थान" अंकित चर्म बैल्ट मेरे आकर्षण का केंद्र बन चुका था, रथयात्रा के प्रस्थान के समय आखिर उनमें से एक युवक के पास जाकर बाल सुलभ भाव से वो बेल्ट मांग ही लिया......! आश्चर्यचकित उस युवक ने स्नेह भाव से सिर पर हाथ फेरकर गाल पर चिकोटी काटते हुए अगली बार आकर देने का वचन देकर विदा ले ली, कितने ही दिनों तक उस बेल्ट का स्वप्न आँखों में उमड़ता रहा, उन भैया जी के आने की प्रतीक्षा भी प्रबल रही पर...

छात्र संघ चुनाव में बढ़ती विकृतियां

 3 वर्षों के बाद राजस्थान के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव आज सम्पन्न हो गए। सभी विजेता प्रतिभागियों को हार्दिक शुभकामनाएं।  इस बार के चुनावों में अलग ही वातावरण देखने, सुनने व समझने को मिला, यह विद्यार्थियों के हितों की बात रखने हेतु यह उनके और प्रबंधन के मध्य कड़ी का कार्य करने के चुनाव मात्र है जो उच्च शिक्षा ग्रहण करने वालों को राजनीतिक परिपक्वता भी प्रदान करता है।  भारतीय राजनीतिक दलों के अंदर जो विकृतियां, विसंगतियां व्याप्त है वो अब छात्र संघ चुनाव में भावी पीढ़ी भी जबरन या इच्छा से ढो रही है यह दुःखद है। धनबल, बाहुबल, जाति बल सहित सभी षड्बल अब छात्र राजनीति में अपना लिए गए है या अपनाने हेतु बाध्य होना आवश्यक हो गया है। हमारी संस्कृति 'विद्यार्थी' जीवन को सुचिता व सद्चरित्र सहित अन्य सद्गुणों को अंगीकृत करने का अवसर मानती है, आज विद्यार्थियों को गुणों के आधार पर नहीं जाति के आधार पर बाँट दिया गया है, सभी समाचार पत्र भी यह बताने में व्यस्त रहे कि फलां जाति या वर्ग के इतने छात्र है, फ़लाँ के इतने......और फ़लां जाति का जीतेगा ...आदि। ऐसे विश्लेषण मन क...

रक्षाबंधन - एक उच्च सनातन परम्परा

रक्षा के पवित्र सङ्कल्प सिद्धि के महान पर्व #रक्षाबंधन  पर सनातन परंपरा के वाहकों को अनन्त #शुभकामनाएं। यह केवल भाई-बहन के सम्बन्धों का त्यौहार मात्र नही है, यह प्रतीक है प्रत्येक उस बन्धन का जो इस वचन के साथ आरम्भ होता है -: ' तुम निश्चिंत रहो की मैं हूँ...' प्राचीन काल में ऋषिगण ईश्वरीय शक्ति व देवताओं को,  विद्वत मनीषियों द्वारा भूपालों व शक्तिशाली मानवों को, भुदेवों व सामान्य जनमानस द्वारा अपने यजमानों को, मातृशक्ति द्वारा अपने हृदय स्वामियों को राष्ट्र व संस्कृति की रक्षा हेतु सदैव अग्रसर रहने हेतु इस पवित्र बंधन से वचनबद्ध किया जाता था। यह हमें स्मरण करवाता है कि समस्त कर्तव्यों में श्रेष्ठ है रक्षा..... वयं रक्षामः । यह संसार के सामर्थ्यशाली समाज को निर्बलों के उत्थान का आह्वान पर्व है। यदि राष्ट्र, धर्म, संस्कृति, परम्पराओं, मान्यताओं, रीतिरिवाजों, संस्कारों और प्रकृति पर्यावरण सहित उन समस्त भावों की रक्षा नही की गई तो शेष कुछ भी नही बचेगा।  केवल रक्त-माँस का पुतला ही मानव नही होता... उसे पूर्णता देने वाली व्यवस्थाओं की रक्षा भी उसका प्रथम धर्म है। यह ...

सत्ता मद के विरुद्ध जनसंघर्ष के नायक : भगवान परशुराम जी

वैदिक कालखंड के आर्यावर्त में हमारे ऋषि मुनि क्षत्रियों को राज सत्ता सौंप उन्हें राष्ट्र और जन दोनों के हित में कार्य करने का निर्देश दे कर आत्म निःश्रेयस भाव से वन में निवास करते हुए निरंतर समाज को देने के लिए नित्य नूतन ज्ञान-विज्ञान के अनुसंधान व तप में लीन रहते थे। इसी प्रकार के एक वैज्ञानिक महर्षि जमदग्नि के घर अक्षय तृतीया को बालक राम का जन्म हुआ। माता रेणुका के स्नेह छाँव में पोषित तथा परम् विद्वान पिता द्वारा प्रदत्त शिक्षा-दीक्षा से पल्लवित युवा राम कठोर तप हेतु हिमालय की गोद में चले गये, इधर सत्ता मद के अहंकार से ग्रसित राजाओं ने आम जनता सहित ऋषि-मुनियों को प्रताड़ित करना आरम्भ कर दिया।  ऐसे शासन में धर्म-कर्म, ज्ञान- विज्ञान के अनुसंधान में बाधाएं उतपन्न होने लगी, सनातन के आधार तत्व गाय, गंगा, गायत्री सभी असुरक्षित अनुभव करने लगे, मदांध राजसत्ता ऋषि गणों के अपमान और शील हरण पर उतर आई। महर्षि जमदग्नि ने नेतृत्व कर कठोर प्रतिकार किया परन्तु राजसी सत्ता ने उनके प्राणों की बली ले ली।  माता रेणुका, कामधेनु गौमाता की चीत्कार और आम जन की करूंण पुकार सुनकर विचलित राम तपस्या ...

पंजाब : अतीत और वर्तमान

भरतखण्ड की ऐसी पवित्र भूमि जहाँ विश्व को दिव्य ज्ञान प्रदान करने वाली सनातन वैदिक सभ्यता का प्रादुर्भाव हुआ, जहाँ ईश्वरीय ज्ञान की प्रतीक वैदिक ऋचाओं का आत्म साक्षात्कार सरस्वती पुत्रों ने किया और वेद जैसे महान ग्रन्थों की भौतिक रचना उन सारस्वतयो ने की, वो ही सारस्तव्य प्रदेश जिसे रामायण में कैकय, महाभारत में सप्तसिन्धु, (सात नदियों की भूमि सिंधु और सरस्वती सहित अन्य नीचे वर्णित 5 नाम), ततपश्चात पंचनद  प्रदेश कहा गया क्योकि यह पाँच नदियों का समाहार प्रदेश है। ये नदियाँ यहाँ की प्रधान पाँच नदियाँ हैं, जो सिन्धु नदी में मिल जाती हैं। शतद्रु (सतलुज), वितस्ता (व्यास), इरावती (रावी), चंद्रभागा (चिनाब) और विशप्ता (झेलम) इसी कारण इसे कालांतर में फारसी शब्द पंजाब (पंज+आब) की उपमा दी गई। यहाँ के लोग युगों से शास्त्र और शस्त्र के धनी रहे, यहाँ की धरती ने खेतों में धान तथा रणभूमि में अपने शीश बोए, यहाँ त्याग और बलिदान ही जीवन का आदर्श रहा, इस पवित्र धरा को जिसे 1947 में दो स्वतंत्र देशों की सीमाओं में बांट दिया पर नाम, भाषा, संस्कृति और परम्पराएं बांटना आसान नही रहा वो ही पंजा...