3 वर्षों के बाद राजस्थान के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव आज सम्पन्न हो गए। सभी विजेता प्रतिभागियों को हार्दिक शुभकामनाएं।
इस बार के चुनावों में अलग ही वातावरण देखने, सुनने व समझने को मिला, यह विद्यार्थियों के हितों की बात रखने हेतु यह उनके और प्रबंधन के मध्य कड़ी का कार्य करने के चुनाव मात्र है जो उच्च शिक्षा ग्रहण करने वालों को राजनीतिक परिपक्वता भी प्रदान करता है।
भारतीय राजनीतिक दलों के अंदर जो विकृतियां, विसंगतियां व्याप्त है वो अब छात्र संघ चुनाव में भावी पीढ़ी भी जबरन या इच्छा से ढो रही है यह दुःखद है। धनबल, बाहुबल, जाति बल सहित सभी षड्बल अब छात्र राजनीति में अपना लिए गए है या अपनाने हेतु बाध्य होना आवश्यक हो गया है।
हमारी संस्कृति 'विद्यार्थी' जीवन को सुचिता व सद्चरित्र सहित अन्य सद्गुणों को अंगीकृत करने का अवसर मानती है, आज विद्यार्थियों को गुणों के आधार पर नहीं जाति के आधार पर बाँट दिया गया है, सभी समाचार पत्र भी यह बताने में व्यस्त रहे कि फलां जाति या वर्ग के इतने छात्र है, फ़लाँ के इतने......और फ़लां जाति का जीतेगा ...आदि। ऐसे विश्लेषण मन को क्लान्त करते है।
जातिवाद, बाड़ाबंदी, मत खरीदने के प्रयास, राजनीतिक छल प्रपंच का प्रयोग, हुड़दंग, विभिन्न दलों व उनके नेताओं के हस्तक्षेप, सत्ता का उपयोग-दुरपयोग जैसी स्थितियां यदि छात्रसंघ चुनावों में दिखती, पनपती है तो क्या अपेक्षा करे कि हम राष्ट्र के भावी नेतृत्व को उभरता देख रहे है।
कमोबेश सभी विद्यार्थी संगठन इस कीचड़ से सने है, कुछ की आदत है तो कुछ मजबूर..... विचारधारा भी एकतरफ रखकर युद्ध लड़ना अब सभी को जरूरी लगता है या हो गया है। विगत 20 वर्षों में छात्र राजनीति ने राजस्थान को कोई ऊर्जावान नेता नहीं दिया है और इन परिस्थितियों को देखते हुए अब अपेक्षा भी नहीं रही।
प्रत्याशी बनने हेतु जाति बल-धनबल का आंकलन, जीतने हेतु जातिय समीकरण व पैसा पानी की तरह बहाने की ताकत होना, आज विद्यार्थी नेतृत्व की योग्यता का मापदंड है, अकादमिक योग्यता कोई विशेष महत्व नहीं रखती।
जीत के बाद भी उनमें से अधिकतर जाति व किसी दल विशेष के नेता होकर रह जाते है, राजनीतिक भविष्य के सुनहरे सपने बुनते है तथा कुछ छोटा-बड़ा प्रतिफल भी प्राप्त कर लेते है, शिक्षण स्थलों के मुद्दे केवल मुद्दे ही रह जाते है..….। जातिय संगठन भी विद्यार्थियों के नेतृत्व को अपनी जाति का नायक घोषित कर लहालोट हो जाते है। यह कटु सत्य है।
क्या सोचकर इस तरह चुनाव लड़े जा रहे है, किस दिशा की तरफ युवा शक्ति बढ़ रही है विचारणीय प्रश्न है। छात्रसंघ चुनावों में सुधार हेतु बनी लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को भी ताक पर रखा जा रहा है...।
इन सबके लिए दोषी कौन है..?
इसमें सुधार कब होगा...?
यह हम सबको, छात्र संगठनों को, राजनीतिक दलों को, सत्ताधारियों को, विश्वविद्यालय प्रशासन को, बुद्धिजीवियों को सोचना होगा तभी नया सूरज उदय हो सकता।
©️ ✒️नरेन्द्र बोहरा नाड़ोल
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