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रक्षाबंधन - एक उच्च सनातन परम्परा

रक्षा के पवित्र सङ्कल्प सिद्धि के महान पर्व #रक्षाबंधन  पर सनातन परंपरा के वाहकों को अनन्त #शुभकामनाएं।

यह केवल भाई-बहन के सम्बन्धों का त्यौहार मात्र नही है, यह प्रतीक है प्रत्येक उस बन्धन का जो इस वचन के साथ आरम्भ होता है -:
' तुम निश्चिंत रहो की मैं हूँ...'

प्राचीन काल में ऋषिगण ईश्वरीय शक्ति व देवताओं को, 
विद्वत मनीषियों द्वारा भूपालों व शक्तिशाली मानवों को,
भुदेवों व सामान्य जनमानस द्वारा अपने यजमानों को,
मातृशक्ति द्वारा अपने हृदय स्वामियों को राष्ट्र व संस्कृति की रक्षा हेतु सदैव अग्रसर रहने हेतु इस पवित्र बंधन से वचनबद्ध किया जाता था।

यह हमें स्मरण करवाता है कि समस्त कर्तव्यों में श्रेष्ठ है रक्षा..... वयं रक्षामः ।
यह संसार के सामर्थ्यशाली समाज को निर्बलों के उत्थान का आह्वान पर्व है।

यदि राष्ट्र, धर्म, संस्कृति, परम्पराओं, मान्यताओं, रीतिरिवाजों, संस्कारों और प्रकृति पर्यावरण सहित उन समस्त भावों की रक्षा नही की गई तो शेष कुछ भी नही बचेगा। 

केवल रक्त-माँस का पुतला ही मानव नही होता...
उसे पूर्णता देने वाली व्यवस्थाओं की रक्षा भी उसका प्रथम धर्म है।

यह भारतीय दर्शन की विशेषता है वो आत्मा की मुक्ति (मोक्ष) की कामना करता है व उस हेतु  कर्म का उपदेश देता है, साथ ही मुक्ति का माध्यम कर्तव्यों के बंधन को 
बताता है। बिना कर्तव्य बन्धन का जीवन स्वछंद होता है, स्वछंदता अधोगति की ओर ले जाती है। इन्ही बंधनों के स्मरण हेतु रक्षाबन्धन है।

मैं भी कटिबद्ध हूँ.... सङ्कल्प याद है...., न भुला हूँ..
न भूलूँगा... यह रेशम का धागा सदैव स्मरण कराता है।
आप भी नही भूलें...।

"....तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।।"

@ नरेश बोहरा 'नरेन्द्र'

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