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युगपुरुष श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी

मित्रों, राजनीति में "अटल" होना बहुत मुश्किल है,
वो भी ऐसी ही धूल में जब आप उस जगह हो
जहां से दीक्षा ही कंटकाकीर्ण पथ हो, अंधकार हो और ऐसे में जब सिर्फ संघर्ष ही आपका भाग्य हो तब तो राजनीति भी अखरती है।

लेकिन ऐसे वातावरण में "हार नहीं मनाना..." का शंखनाद करते हुए बढ़ते जाना, सामुहिक सफलता के सोपान चढ़ना, लेकिन वो भी इस निर्लिप्त भाव से की "....मुझे राजनीति नहीं अच्छी लगती....और मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं न्यूनतम बनूंगा.... "।

विभिन्न सम-विषम राजनीतिक उद्घोषों के दौर में, दल को और देश को शीर्ष पर स्थापित करने के लक्ष्य को थामे "क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं व्यक्तित्व में... का उद्घोष केवल और केवल "अजातशत्रु" अटलजी ही कर कर सकते थे।

अटलजी ने ही कहा था कि जनता सरकार के अवसान के बाद जब लगा कि राजनीतिक विकल्प के रूप में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई तो एक हुंकार भरी थी कि "अँधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा"।

25 दिसंबर 1924 को साझीदार और बाल्यकाल से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक के रूप में 1951 में संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय श्री गुरुजी की प्रेरणा से पंडित अध्याप्ति के सहयोगी के रूप में राजनीति की यात्रा प्रारंभ करने वाले अटलबिहारी जी ने
एक सामान्य स्वयंसेवक से लेकर प्रधानमंत्री तक कि जिम्मेदारी जिले में उन्होंने हमेशा प्रतिभागियों से, दार्शनिकों से और सहयोगियों से पोर्टफोलियो रखा।

उन्होंने जो सपना देखा देश के विकास और जनता के आंदोलन के लिए, उन्हें सरकार पर गठबंधन की रूढ़िवादी विचारधारा में भी पूरा करने का प्रयास किया गया, उन्होंने राष्ट्र निर्माण की एक ऐसी पहल की, जिस पर विकसित भारत को अपनी पहचान बनानी थी, आज हम सब देख रहे हैं है. आज उनकी बनाई और संकल्पित अनेकों विकास की योजनाएं पूर्णता प्राप्त कर रही हैं।

देश के लिए उनकी एकमात्र भूमि का टुकड़ा मात्रा न था वो जीता जगता राष्ट्रपुरुष था जिसका कंकर कंकर शंकर है। उनके विचारों में भारत तर्पण की, अर्पण की और दान की भूमि है। इन्ही भावों को आत्मस्थ कर उन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व समर्पित किया।

आज जब राजनीति में आना एक पेशा सा बन गया है, तो उसमें एक ऐसा चरित्र आ गया है, जिसमें अटल जी को लेकर उत्सुकता बनी हुई है।

वर्तमान में कतिपय नेताओं व परिवार वादी दलों ने राजनीति को येन–केन प्रकरण अपनी स्वार्थपूर्ति का साधन बना दिया है, ऐसे में उनकी वाणी ध्येयनिष्ठ कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करती हुई सबके कानों में गूंजती है जो उन्होंने संसद में अपने उद्बोधन में कही थी- " अनैतिक तरीकों से प्राप्त सत्ता को मैं चिमटे से भी छूना पसन्द नही करूँगा"।

अपने दृढ़ निश्चयी और राष्ट्र समर्पित जीवन के दैहिक अवसान 16 अगस्त 2018 तक एक कवि हृदय राजनीतिज्ञ वाजपेयी जी सदैव अपनी ही इन पंक्तियों को आत्मसात कर कर्मशील रहे -

"मेरे प्रभु! 

मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना

गैरों को गले न लगा सकूँ

इतनी रुखाई कभी मत देना।"

आज उन महामानव को पावन स्मरण के साथ शत शत नमन।

@ नरेश बोहरा "नरेन्द्र"
नाड़ोल-राजस्थान
मोबाइल 9928588548

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