आज भारतवर्ष के दो महान व्यक्तित्व का जन्मदिवस है, पहला लोकनायक श्री जयप्रकाश नारायण जी का और दूसरा कर्मयोगी राष्ट्रऋषि श्री नानाजी देशमुख का।
अद्भुत संयोग की कल रात्रि को ही श्रद्धेय नानाजी लिखित पुस्तक "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" पढ़कर पूर्ण की। दो विलक्षण महापुरुषों के जीवन के बारे में हमे इस पुस्तक से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। स्वतंत्रता सेनानी जेपी साहब और संघ के प्रचारक तथा बाद में जनसंघ के वरिष्ठ नेता रहे नानाजी का सम्बंध और चिंतन अत्यंत आत्मिक व एकात्म था। जयप्रकाश जी महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे तो नानाजी संघ के उन प्रारंभिक स्वयंसेवकों में से थे जिन्होंने संस्थापक प. पूज्य डॉ हेडगेवारजी की प्रेरणा से प्रचारक जीवन अंगीकृत कर उत्तरप्रदेश को अपनी कर्मभूमि बनाया, दीनदयाल उपाध्याय जी नानाजी की ही खोज थे।1973 में गुजरात के छात्र आंदोलन, तथा 1974 के ऐतिहासिक बिहार के सम्पूर्ण क्रान्ति आंदोलन जिसने देश की जवानी और छात्र शक्ति को जगाकर अन्याय के विरुद्ध लड़ने का जो मंत्र जयप्रकाश जी ने प्रदान किया, उसका वृद्धावस्था में नेतृत्व किया उसमें उनके पूर्ण सहयोगी नानाजी देशमुख ही थे। यही वो आंदोलन था जिसने भृष्टाचार के आकंठ में डूबी इंदिरा सरकार को खुली चुनौती दी तथा व्यवस्था परिवर्तन का आह्वान किया। इसी से डरकर इंदिरा ने 1975 में आपातकाल लगाकर लोकतंत्र व संविधान की निर्मम हत्या कर दी। तब जेपी के आह्वान और संघ के अभियान से प्रेरित लाखों कार्यकर्ताओं, विद्यार्थियों ने इस निर्णय के विरुद्ध निर्णायक अहिंसक युद्ध छेड़ा और लंबे संघर्ष, कठोर यातनाओं तथा परिश्रम से इस पर विजय प्राप्त की। तब भी नानाजी ही जे पी के सारथी रूप में साथ थे।
इंदिरा के राजनीतिक विकल्प के रुप मे जयप्रकाश नारायण जी ने जब सम्पूर्ण विपक्ष के एकजुट होने की बात कही तब नानाजी ने ही सर्वप्रथम इसमें जनसंघ की तरफ से स्वीकृति प्रदान की। जनता पार्टी के उदय और इंदिरा के सत्ताच्युत होने के बाद प्रथम गैर कॉंग्रेस सरकार के निर्माण में लोकनायक का त्याग और तपस्या तथा नानाजी का अथक परिश्रम सम्मिलित था परन्तु सत्ता लिप्सा दोनों में नही थी। लोकनायक ने 1954 में ही सत्ता व पद की राजनीति का परित्याग कर दिया था तो नानाजी ने भी सांसद होते हुए भी सरकार में कोई पद नही लिया।
यह पुस्तक नानाजी के संस्मरणों व अनुभवों का अद्भुत समिश्रण है, नानाजी ने इस पुस्तक के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति, सत्ता मोह के बजाय समाज निर्माण का संकल्प व राष्ट्रनिर्माण की योजना को हमारे समक्ष रखते हुए जनता पार्टी सरकार में पद लिप्सा व सत्ता के भूखे नेताओं द्वारा संघ पर अनर्गल आरोप लगाने वालों को बेनकाब किया है। जनता पार्टी के आपसी कलह तथा ध्येय समर्पित जनसंघ पदाधिकारियों की संघ निष्ठा के कारण उन्हें दोहरी सदस्यता का नाता रखने के नाम पर अलग-थलग करने के षड्यंत्रों को उजागर किया है।
नानाजी ने जनता पार्टी की आपसी कलह से परेशान जेपी के दर्द व उनके टूटते सपनों को प्रकट करते हुते इसके प्रमुख दोषियों जिसमें चौधरी चरणसिंह का दोहरा व्यवहार, प्रधानमंत्री बनने का लोभ, राजनारायण, मधु लिमये, मधु दण्डवते जैसे समाजवादियों की कमजोर निष्ठाओं, कॉंग्रेस से सांठगांठ, अन्य लोगों की भीरू वृति को पुस्तक में उजागर किया है, इनके कारण ही जनता पार्टी टूटी है यह स्पष्ट किया है। युवा तुर्क कहे जाने वाले चंद्रशेखर अध्यक्ष होकर भी कुछ खास नही कर पाए यह जनता पार्टी के महासचिव के नाते नानाजी ने जो सहा व देखा वही पीड़ा व्यक्त की है।
जयप्रकाश नारायण जी के समान ही नानाजी ने 1978 में ही राजनीतिक जीवन से सन्यास की घोषणा कर अपने मार्गदर्शक का अनुसरण कर ग्राम विकास व गरीबों के उत्थान का स्वप्न लेकर दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से उत्तरप्रदेश के गोंडा, चित्रकूट व बुंदेलखंड के गांवों का समग्र विकास करने के लिए उन्होंने वृहद स्तर पर कार्यक्रम चलाए और लगभग 500 से ज्यादा गांवों को आत्मनिर्भर बनाया। जयप्रकाश जी को श्रद्धांजलि स्वरूप स्थापित जयप्रभा गाँव आज उनके कार्यों को प्रकट करता है। 1991 में भारत के प्रथम ग्रामीण विश्वविद्यालय "महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय" की स्थापना जयप्रकाश जी के सपनों को साकार रूप देने का प्रयास है।
उत्तरप्रदेश, मराठवाडा, मध्यप्रदेश, बिहार के कितने ही गाँव नानाजी के प्रयासों व परिश्रम से स्वावलंबी हुए है।
उनके प्रिय मित्र व सहयोगी श्री अटलबिहारी जी ने 1999 में नानाजी को पद्मविभूषण से अलंकृत किया, 2019 में श्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया। अद्भुत संयोग की लोकनायक जयप्रकाश जी भी भारत रत्न अलंकरण से सम्मानित हुए थे।
27 फरवरी 2010 को नानाजी ने इस धरा से महाप्रस्थान किया तथा पूर्व घोषणा अनुसार उनकी देह मेडिकल कॉलेज को शोध हेतु दान की गई।
आज जन्मजयंती पर दोनों महामानवों जो सदैव ही राष्ट्रीय कार्य में आपसी सहयोगी रहे को शत शत नमन।
✒️©️ नरेश बोहरा "नरेन्द्र"
नाड़ोल ( राजस्थान)
इंदिरा के राजनीतिक विकल्प के रुप मे जयप्रकाश नारायण जी ने जब सम्पूर्ण विपक्ष के एकजुट होने की बात कही तब नानाजी ने ही सर्वप्रथम इसमें जनसंघ की तरफ से स्वीकृति प्रदान की। जनता पार्टी के उदय और इंदिरा के सत्ताच्युत होने के बाद प्रथम गैर कॉंग्रेस सरकार के निर्माण में लोकनायक का त्याग और तपस्या तथा नानाजी का अथक परिश्रम सम्मिलित था परन्तु सत्ता लिप्सा दोनों में नही थी। लोकनायक ने 1954 में ही सत्ता व पद की राजनीति का परित्याग कर दिया था तो नानाजी ने भी सांसद होते हुए भी सरकार में कोई पद नही लिया।
यह पुस्तक नानाजी के संस्मरणों व अनुभवों का अद्भुत समिश्रण है, नानाजी ने इस पुस्तक के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति, सत्ता मोह के बजाय समाज निर्माण का संकल्प व राष्ट्रनिर्माण की योजना को हमारे समक्ष रखते हुए जनता पार्टी सरकार में पद लिप्सा व सत्ता के भूखे नेताओं द्वारा संघ पर अनर्गल आरोप लगाने वालों को बेनकाब किया है। जनता पार्टी के आपसी कलह तथा ध्येय समर्पित जनसंघ पदाधिकारियों की संघ निष्ठा के कारण उन्हें दोहरी सदस्यता का नाता रखने के नाम पर अलग-थलग करने के षड्यंत्रों को उजागर किया है।
नानाजी ने जनता पार्टी की आपसी कलह से परेशान जेपी के दर्द व उनके टूटते सपनों को प्रकट करते हुते इसके प्रमुख दोषियों जिसमें चौधरी चरणसिंह का दोहरा व्यवहार, प्रधानमंत्री बनने का लोभ, राजनारायण, मधु लिमये, मधु दण्डवते जैसे समाजवादियों की कमजोर निष्ठाओं, कॉंग्रेस से सांठगांठ, अन्य लोगों की भीरू वृति को पुस्तक में उजागर किया है, इनके कारण ही जनता पार्टी टूटी है यह स्पष्ट किया है। युवा तुर्क कहे जाने वाले चंद्रशेखर अध्यक्ष होकर भी कुछ खास नही कर पाए यह जनता पार्टी के महासचिव के नाते नानाजी ने जो सहा व देखा वही पीड़ा व्यक्त की है।
जयप्रकाश नारायण जी के समान ही नानाजी ने 1978 में ही राजनीतिक जीवन से सन्यास की घोषणा कर अपने मार्गदर्शक का अनुसरण कर ग्राम विकास व गरीबों के उत्थान का स्वप्न लेकर दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से उत्तरप्रदेश के गोंडा, चित्रकूट व बुंदेलखंड के गांवों का समग्र विकास करने के लिए उन्होंने वृहद स्तर पर कार्यक्रम चलाए और लगभग 500 से ज्यादा गांवों को आत्मनिर्भर बनाया। जयप्रकाश जी को श्रद्धांजलि स्वरूप स्थापित जयप्रभा गाँव आज उनके कार्यों को प्रकट करता है। 1991 में भारत के प्रथम ग्रामीण विश्वविद्यालय "महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय" की स्थापना जयप्रकाश जी के सपनों को साकार रूप देने का प्रयास है।
उत्तरप्रदेश, मराठवाडा, मध्यप्रदेश, बिहार के कितने ही गाँव नानाजी के प्रयासों व परिश्रम से स्वावलंबी हुए है।
उनके प्रिय मित्र व सहयोगी श्री अटलबिहारी जी ने 1999 में नानाजी को पद्मविभूषण से अलंकृत किया, 2019 में श्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया। अद्भुत संयोग की लोकनायक जयप्रकाश जी भी भारत रत्न अलंकरण से सम्मानित हुए थे।
27 फरवरी 2010 को नानाजी ने इस धरा से महाप्रस्थान किया तथा पूर्व घोषणा अनुसार उनकी देह मेडिकल कॉलेज को शोध हेतु दान की गई।
आज जन्मजयंती पर दोनों महामानवों जो सदैव ही राष्ट्रीय कार्य में आपसी सहयोगी रहे को शत शत नमन।
✒️©️ नरेश बोहरा "नरेन्द्र"
नाड़ोल ( राजस्थान)
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