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शिक्षक दिवस

 शिक्षक दिवस पर समस्त शिक्षकवृन्दों को सादर प्रणाम करते हुए शुभकामनाएं प्रदान करता हूँ।

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भारतीय सन्दर्भ में शिक्षा व शिक्षक का विशेष महत्व व हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। सनातन संस्कृति में गुरु परम्परा अनादि काल से स्थापित है तथा आगे भी यथावत रहेगी। यह देश ऋषि परम्पराओं को मानने वाले लोगों का देश है, राष्ट्रोंमुखी चरित्र निर्माण का कार्य इस देश की गुरु परम्परा ने सदैव किया है, यहां सन्तान जब गुरुकुल में प्रविष्ट होती थी उसी दिन से वो गुरु की संपति बन जाती थी तथा गुरु उस हाड़-माँस के सजीव प्राणी में उच्च संस्कारों, दिव्य ज्ञान और श्रेष्ठ गुणों की प्रतिष्ठा कर उसे समाज के लिए अनुकरणीय, वन्दनीय व्यक्तित्व बना देते थे। 


हमारे वेदों, उपनिषदों में शिक्षा एक संकुचित अर्थों का शब्द है, हमारे यहां विद्या का महत्व है, आजकल शिक्षा और विद्या एक ही मान लिया गया है यही भृम अनेक समस्याओं की जड़ है। शिक्षा की पूर्णता हो सकती है विद्या की नही, मनुष्य जीवन भर शिक्षार्थी नही रह सकता है परन्तु उसे सदैव विद्यार्थी रहने का शास्त्र निर्देश है, यही उसकी उन्नति का मार्ग है। यहां हम लेखनीय सुविधा और सहज समझने की दृष्टि से विद्या और शिक्षा को एक ही अर्थ में लेकर बात करेंगे। 


शिक्षा ज्ञान तक पहुंचाने का पथ प्रकट करती है तथा शिक्षक उस पथ पर हमें ज्ञान प्राप्ति हेतु अग्रसर करते है इसे वेद " तमसो मा ज्योतिर्गमय" की परिभाषा देते है। शिक्षा ही वो विधा है जो हमारे अंदर ज्ञान प्राप्त करने की उत्कंठा को जागृत करती है और शिक्षक हमारी उत्कंठा को यथेष्ट ज्ञान का दर्शन करवाते है। ठीक वैसे ही जैसे मन्दिर के पुजारी भक्तों को नियमावली समझाकर विग्रह दर्शन करवाते है। 


प्राचीन काल से ही भारतवर्ष में गुरुकुलों के माध्यम से समाज के सभी वर्गों को बिना किसी भेदभाव के गुरुजनों द्वारा शिक्षा प्रदान की जाती रही है। गुरुकुल नन्हे अबोध विद्यार्थियों को एक सुयोग्य व श्रेष्ठ गुणों युक्त नागरिक के रूप में निर्मित कर समाज को सौपते रहे है और यही भारत के महान उत्कर्ष का आधारभूत कारण रहा है। अपने शिक्षार्थियों का सर्वांगीण विकास करना, उसकी अभिरुचियों को जगाकर उसके अनुसार उसे विद्या प्रदान करना शिक्षकों का महत्वपूर्ण दायित्व युगों तक रहा है। 


भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण से लेकर इस आर्यभूमि पर अनेकों ऋषि-महर्षि, सन्त, सम्राट, वीर योद्धा, उत्कृष्ट वैज्ञानिक, विद्वान आमात्य, चिकित्सक, श्रेष्ठी, सेवक, कृषक, कलाकार, समाजिक जीवन को चलाने हेतु निर्मित व्यवस्थाओं के कुशल संचालक हमारे गुरुकुलों में गुरुजनों द्वारा निर्मित हुए है और उन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा व संस्कारों से इस राष्ट्र के गौरव को बढ़ाया है। 


विदेशी आक्रमणकारियों की कुदृष्टि से भारत की रक्षा का चिंतन करने वाले विष्णुगुप्त चाणक्य शिक्षक थे, जब राजसत्ता मदान्ध हो इन खतरों से अनभिज्ञ होने लगी तब अखण्ड भारत की रक्षार्थ चन्द्रगुप्त का निर्माण आचार्य चाणक्य के नेतृत्व में शिक्षकों ने ही किया। भारत में तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय ज्ञान के वैश्विक केंद्र थे जहाँ व्यक्तित्व निर्माण का पुनीत कार्य अहोरात्र आदर्श शिक्षकों के ही जिम्मे था और उसी के परिणामस्वरूप भारत की हजारों वर्षों तक सामरिक सुरक्षा हुई। भारत अर्थ जगत में सोने की चिड़िया कहलाया तथा ज्ञान-विज्ञान के शोध का केंद्र बना। 


इस्लामिक आक्रमणकारियों ने भारत को दारुल हरब से दारुल इस्लाम में परिवर्तित करने में सबसे बड़ी बाधा यही गुरुकुल और शिक्षा व्यवस्था लगी, इसी कारण सर्वाधिक विध्वंस इन्होंने ही झेला, तक्षशिला और नालन्दा को भस्मीभूत कर हमारे अथाह ज्ञान भंडार और हजारों वर्षों के शोध कार्यो को, उनके प्रयोगों को नष्ट कर दिया गया जिसका परिणाम आज तक हम भुगत रहे है। बर्बर जेहादियों की तलवार को रणभूमि में लाखों वीर योद्धाओं ने तथा गुरुकुलों में लाखों शिक्षकों ने झेलकर प्राणाहुति दी। 


ईसाई मिशनरियों और व्यापारियों ने जब भारत को सम्पूर्ण अधीन करने का दुःस्वप्न संजोया तब भी उनको उस समय के प्रतिकूल वातावरण में ज्ञान दीप को जलाए रखने वाले शिक्षक तथा गुरुकुल ही सर्वाधिक खटके, लॉर्ड मैकाले की भारत यात्रा और उसकी ब्रिटेन संसद में प्रस्तुत की गई रिपोर्ट इसका उदाहरण है। गुरुकुल नष्ट कर आधुनिक शिक्षा पद्वति लागू कर भारत के मूल ज्ञान-विज्ञान, कौशल विकास आधारित शिक्षा पद्वति को नष्ट कर दिया गया। हजारों-लाखों शिक्षक जो पीढ़ियों से इसी पवित्र कार्य में लगे हुए थे एक ही झटके में आधारविहीन हो गए, समाज का एक बड़ा वर्ग जो इस कार्य के अलावा अन्य किसी व्यवस्था का हिस्सा रहा ही नही, हजारों वर्षों से समाज इनका भरण पोषण करता आ रहा था, जिन्हें कभी कृषि या व्यापार आदि करने की आवश्यकता कभी रही ही नही जो भूस्वामी भी नही रहा, बड़ी निर्दयता से दाने-दाने का मोहताज कर दिया गया, उसे आजीविका हेतु अन्य कार्य चुनने को बाध्य कर दिया, नई व्यवस्था में ढलते-ढलते पीढियां बीत गई। 


अंग्रेजों के द्वारा रचित कुचक्र के कार्य जो शिक्षा व्यवस्था हम पर थोपी गई उसमें न तो भारतीयता थी न आत्म गौरव, शिक्षक जैसा गरिमामय पद एक वेतनभोगी कर्मचारी का हो गया। हमारी शिक्षा पद्वति का मूल उद्देश्य " सा विद्या या विमुक्तये" विलोपित हो गया, कौशल विकास व आत्मनिर्भर नागरिकों के निर्माण के बजाय डिग्रीधारी, धर्म विमुख काले अंग्रेज इन मिशनरी स्कूलों से निकलने लगे। समाज का निर्धन व उपेक्षित वर्ग, महिलाएँ आदि बुनियादी शिक्षा से वंचित कर दी गई यह केवल धनाढ्य लोगों का स्टेटस बनकर रह गया। 


आजादी के बाद भी दुर्भाग्य से यही स्थिति बनी रही, हमारी आशाओं व अपेक्षाओं के विपरीत स्वतंत्रता भारत की बागडोर एक अंग्रेजी शिक्षित, मानसिक रूप से अंग्रेज नेतृत्व के हाथों में आई तथा देश की शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी एक ऐसे व्यक्ति को दी गई जो स्वयं भी काला अंग्रेजी लाट साहब, अभारतीय धर्म को मानने वाला, विदेशों में पढ़ा लिखा और इस्लामिक धार्मिक शिक्षा प्राप्त मौलाना था जिससे किसी प्रकार के ढांचागत सुधार की अपेक्षा करना बेमानी ही था।  हमारी शैक्षणिक संस्थाओं के पाठ्यक्रमों में थोड़ा बहुत शेष भारतीय गौरव भी इनके प्रयासों से विलुप्त हो गया, जिन बर्बर जेहादी आक्रांताओ ने लाखों शिक्षकों का रक्त बहाया वो किताबों में महान बताकर प्रस्तुत किये गए। पाठ्यक्रम सामग्री तय करने का अधिकार शुरू से भारत, भारतीयता और सनातन संस्कृति के प्रति विद्वेष व कलुषित मानसिकता रखने वाले चीनी दलाल वामपंथियों को सौप कर सम्पूर्ण बौद्धिक संस्थाओं पर इनका अवैध कब्जा करवा दिया गया। हमारी आगामी पीढ़ियों को राष्ट्रीय गौरव के आख्यानों, महापुरुषों, प्राचीन ज्ञान-विज्ञान व स्वर्णिम अतीत के सुनहरे पृष्ठों से अनभिज्ञ रखने का यह आपराधिक षड्यंत्र इन वामपंथियों ने किया, जिससे हम स्वयं को सदैव हीन व पिछड़ा ही समझते रहे। 


इसके परिणामस्वरूप आज वो वन्दनीय शिक्षक केवल एक सरकारी कार्मिक मात्र है, उन्हें क्या, कितना और कब पढ़ाना है यह सरकारें तय करती है, सत्य जानकर भी किताबी असत्य को पढ़ाना मजबूरी है, उसके ऊपर अनेकों दबाव है, वो शिक्षक के साथ-साथ एक दस्तावेज लेखक बना दिये गए है। 


आज शिक्षा भी भयानक बदलाव को झेल रही है, शिक्षा एक ब्रांड बन गई है, उसे उधोग बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है, बड़े-बड़े औद्योगिक घराने इस क्षेत्र में आ गए है, सुविधाओं को ही शिक्षा का उचित माध्यम मानकर पंच सितारा सुविधाओं युक्त विद्यालय यत्र-तत्र पसर गए है, शिक्षक एक वेतनभोगी कर्मचारी है जो एक मशीन की तरह अपनी उत्पादकता बनाये रखना चाहता है, विद्यार्थियों की तितिक्षा शांत करने की बात अब बेमानी है, अभिभावक भी अपने स्थानीय राजकीय/निजी विद्यालयों को गौण समझ निरुद्देश्य केवल नाम के पीछे अपना धन व समय तथा संतानों की मनोदशा को नष्ट कर रहे है। डिग्रियां ही ज्ञान का आधार हो गई है, शिक्षा जो कभी मुक्ति का आधार मानी जाती थी अब नए सन्दर्भ में " सा विद्या या नियुक्तये" तक सीमित हो गई है। विद्यार्थियों की जिज्ञासा प्रवृति नष्ट हो रही है, कभी इसी जिज्ञासा भाव ने वेदों के सार रूप उपनिषदों का निर्माण किया था आज हमारी प्रश्न पूछने की क्षमता समाप्ति की ओर है। अब प्रश्न पूछना एक्स्ट्रा कोचिंग की श्रेणी में आ गया है, हर प्रश्न चार्जेबल है चाहे आप संतुष्ट हो या न हो। शिक्षा मार्केट का माल बनकर बिक रही है, चरित्र और राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य कही पीछे छूट गए है। 


वो शिक्षक जो राष्ट्रनिर्माता है आज चिंतित है क्योकी उसके अंदर ही विभाजन है, कितने ही शिक्षक, आचार्य, गुरुजन की परिभाषा से निकल कर सर और फैकल्टी टीचर हो गए है, वो विविधता के बजाय सब्जेक्ट टीचर मात्र बन गए है, वो केवल एम्प्लॉई मात्र हो गए है उन पर समाज और देश को श्रेष्ठ नागरिक देने की कोई जिम्मेदारी नही है, उन पर केवल अपना कोर्स पूरा करने व रिजल्ट देने की चिंता मात्र है। जो व्यवस्था कभी गुरुकुल कहलाती थी वो पाठशाला व विद्यालय के स्वरूप को भी त्याग कर कब स्कूल और आज कोचिंग इंस्टिट्यूट बन गई,  यह विडम्बना है हमारी सरकारी नीतियों व सत्ताधारियों के अविवेक की जिसका भुगतान विद्यार्थी, अभिभावक व समर्पित शिक्षक सब कर रहे है। अब केवल परसेंटेज का दबाव है और यही दबाव प्रतिवर्ष अनेकों शिक्षार्थियों को लील रहा है। 


जो आज भी उसी चाणक्य स्वरूप शिक्षक की भूमिका का निर्वाह कर समाज को चन्द्रगुप्त प्रदान करते है उनका अस्तित्व खतरे में है, वो दोहरी मार झेल रहे है कर्तव्यों के निर्वहन के साथ-साथ परिस्थितियों से सामंजस्य रखना बड़ी चुनोती है, ईश्वर उन्हें सम्बल प्रदान करे क्योकि ऐसे ही शिक्षक शिक्षा जगत में नवाचारों को जन्म देते है, कोरोना व अन्य आपदाओं के समय समाज की सेवा करते है,  अपने विद्यालय को मन्दिर समझते है तथा बालकों को भगवान... उनकी सेवा को ही धर्म समझते है ऐसे समस्त राजकीय/अराजकीय शिक्षकगण, शिक्षा मन्दिरों के संचालक जो माता सरस्वती की साधना में लीन हो राष्ट्रनायकों को गढ़ रहे है, जो समाज से अबोधता को लेकर बदले में गुणवान, शालीन, विनयी, चरित्रवान, बुद्धिमान, कौशलता से युक्त आत्मनिर्भर नागरिक उपलब्ध करवा रहे है उन्हें आज इस लेख के माध्यम से अपना प्रणाम निवेदित करता हूँ। 


✒️ ©️ नरेश बोहरा "नरेन्द्र"

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