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दृढ़ विश्वास और अटल श्रद्धा

 #दृढ़_विश्वास #अटल_श्रद्धा

आज का ब्लॉग

दृढ़ विश्वास की कमी मनुष्य के लिए बहुत घातक होती है, यही वो कमी है जो उसे आस्था, धर्म, इष्ट आराध्य और कर्तव्यपथ से विमुख कर अंधविश्वास, पाखण्ड, निराशा और पतन की तरफ ले जाती है। 

सनातन संस्कृति में दृढ़ विश्वास के अनेकों उदाहरण स्पष्ट है, बालक ध्रुव को विश्वास है कि भगवान उसे पिता की गोद में बैठने का अधिकार देंगे..., भक्त प्रह्लाद निश्चिंत है कि उसे प्रभु ही  बचाएंगे, शिलावत सती अहिल्या और माता शबरी आश्वस्त है कि उनके श्रीराम आएंगे, द्रौपदी जानती थी कि पंच महारथियों की पत्नी होने के बाद भी यदि वस्त्र और मर्यादा का हरण हो रहा है तो श्रीकृष्ण अवश्य अपना वचन निभाएंगे। और ये सब उदाहरण युगों युगों के लिए अमर हो गए केवल दृढ़ विश्वास और अगाध श्रद्धा के बल पर.....क्योकि यह अटूट विश्वास ही श्रद्धा को जन्म देता है। 

हम मनुष्यों को भगवान ने स्वयं श्री गीताजी में वचन दिया है 

" यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।" 

श्री रामचरित मानस में तुलसीदास जी ने विश्वास को वट की संज्ञा देते हुए उसे अचल कहा है।

"बटु बिस्वास अचल निज धरमा।

मानस के अरण्य काण्ड में माता शबरी से भेंट के उपरांत प्रभु श्रीराम उन्हें नवधा भक्ति का ज्ञान देते हुए कहते है -

"मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥" 

हमनें हमारे पूर्वजों की अनमोल थाती स्वरूप पवित्र धर्म ग्रन्थ, शास्त्र आदि तज दिए उन्हें केवल पुजनीय बना दिया पठनीय नही। परिणामस्वरूप हमारी धार्मिक आस्थाएं कमजोर हुई, विदेशी आक्रांताओं के मुकाबले में हम कमजोर आस्थावान लोग नही टिक पाए, हमें अपने ईश्वर, शास्त्र उपदेश, शस्त्रविद्या, बल पौरुष पर भरोसा नही रहा और हमारी सांस्कृतिक आधारशिलाएं एक एक कर ध्वस्त होती गई। 

हमनें अपने सर्वकाज संधारण हेतु नायकों का निर्माण भी किया परन्तु उन पर भी पूर्ण विश्वास नही किया और न ही पूर्ण मनोयोग से समर्थन दिया, नायक को जब-जब समाज के विशिष्ट सहयोग की आवश्यकता पड़ी केवल कुछ प्रतिशत को छोड़ शेष ने अपने व्यक्तिगत लाभ-हानि का गुणा भाग कर निर्णय लिया। इसी कारण राजा दाहिर सेन से लेकर पेशवाओं और उनसे भी आगे तक भाई के सामने भाई ही लड़ा जिसका परिणाम हमनें एक दीर्घकालीन, त्रासदीपूर्ण गुलामी के रूप में भोगा, जिसकी भरपाई असम्भव है, राष्ट्र ने बहुत कुछ खोया।

कई लोगों ने तो केवल मूकदर्शक रहकर भी राष्ट्र और धर्म को बहुत हानि पहुंचाई।

आदरणीय अटल जी का एक भाषण है जिसमें वो कहते है- " जितने लोग प्लासी की जंग लड़ रहे थे, उससे अधिक युद्ध भूमि के बाहर परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे।" ...हमनें हमारे नायकों को कभी पूर्ण सहयोग तब भी नही किया था, आज भी नही करते है, अपेक्षाएं अनन्त रहेगी पर हम अपना भोग नही देंगे। इस्लामी जेहादियों से संघर्ष हो या 200 वर्षों की अंग्रेजी गुलामी का समय, हम किसी पर आश्वस्त नही हो पाए और न ही दृढ़ विश्वास से एक हो लड़ पाए, व्यक्तिगत कुण्ठाओं को, द्वेष को, वैर को हमने राष्ट्रीय स्वाभिमान से ज्यादा मान लिया। 

आज भी राष्ट्रद्रोही वामपंथी, छद्म सेक्युलरिज्म के सरपरस्त और सनातन विरोधी नित नए नैरेटिव गढ़ रहे है, हम फंस रहे है। 

आज भी समाज को, अपने ही लोगों को, अपने ही लोग निहित तुच्छ स्वार्थों, क्षणिक सुविधाओं के लोभ में बरगला रहे है, उन्हें देश, संस्कृति और सनातन मान्यताओं से दूर कर रहे है। क्षुद्र विषयों को विस्तारित कर हिन्दू धर्म के विरुद्ध वातावरण निर्माण कर रहे है जो विचारणीय और गम्भीर चिंतन का विषय है। 

आज इन्ही लोगों के बहकावे में आकर क्षणिक बात पर हीअपने दिग्भ्रमित भाई सीधे ही " हम हिन्दू नही है या ये धर्म छोड़ देंगे.." का राग अलाप लेते हैं, चाहे वो धर्म की व्याख्या ही न जानते हो पर बोलेंगे जरूर, क्योकि धार्मिक विश्वास की नींव कमजोर है।

वनवासी अँचल में ईसाई मिशनरियों द्वारा चावल और दाल सहित तुच्छ सुविधाओं पर मतांतरण करवाया जा रहा है, कारण यही की हमारी नई पीढ़ी के श्रद्धा और दृढ़ विश्वास के मानदंड कमजोर है। 

पढ़ा लिखा आधुनिक समाज भी इससे अछूता नही है, उन्हें मनीषियों, ऋषियों का ज्ञान, हमारी परम्परायें, संस्कृति, सामाजिक संस्कार ओल्ड लगता है, उनकी मॉर्डन लाइफ में यह बोरिंग जैसा है कुछ स्पेशल नही है और इसी कारण सर्वाधिक भटकाव भी यहीं दिख रहा है जो एक यक्ष प्रश्न है। अधिक सुविधाओं को पाने, आर्थिक लाभ की अपेक्षा से और सही मार्गदर्शन के अभाव में इन्ही के द्वारा रामपाल, राम-रहीम सहित सैकड़ों पाखंडियों को पनपाया जा रहा है, ऐसे दिशाहीन भटके लोग ही मन्दिर-चर्च और मस्जिदों, दरगाहों, मजारों में अंतर नही समझ पाते, इनके हिसाब से गॉड सब जगह है का रट्टा मार दिया जाता है, यही लोग इन दरगाहों, मज़ारों, चर्चो के आर्थिक आधार है, सर्वाधिक भीड़ यहां हिन्दुओं की इसलिए लगती है। 

आइये हम अपने मन के दृढ़ विश्वास और ईश्वर के प्रति श्रद्धा को इतना मजबूत कर दे कि कोई उसे हिला भी न पाए।

सशक्त हिन्दू ही समर्थ राष्ट्र का भाग्यविधाता है।

पूज्य स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है -:

जब तक तुम्हारे हृदय में उत्साह एवं गुरु तथा ईश्वर में विश्वास - यह तीनों वस्तुएं रहेंगी, तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता।  

@ नरेश बोहरा " नरेंद्र" (नाड़ोल)

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