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सत्यमेव जयते - राजस्थान

अंततः वही हुआ जो सत्ता के मदान्ध नेतृत्व के मन में तय था....।

जयपुर ग्रेटर नगर निगम भ्र् ष्टाचार प्रकरण में वायरल हुए वीडियो को आधार बनाकर पूर्व नियोजित रूप से राजस्थान की एसीबी ने बिना किसी ठोस आधार के संघ के क्षेत्रीय प्रचारक जी को भी आरोपी बना लिया। कथित वीडियो में दिखाई मात्र दे रहे आदरणीय निम्बाराम जी भाई साहब को अन्य आरोपियों के समकक्ष मानकर राजस्थान की अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉंग्रेस सरकार ने अपनी उसी कुत्सित मानसिकता का परिचय दिया है जो कभी उनके पूर्वर्ती राष्ट्रीय नेतृत्व की रही है। 

सर्व विदित है कि अशोक गहलोत सत्ता के चिपकू नेता है, सोनिया गांधी और राहुल, प्रियंका की जी हजूरी करके वो इस तीसरी बार  मुख्यमंत्री बने है जबकि इस बार सम्पूर्ण परिश्रम किसी अन्य का था परन्तु गहलोत की चालाकी ने उनसे मुख्यमंत्री की कुर्सी सहित अन्य पद व सम्मान भी छीन लिए, आज वो राजनीतिक रूप से दर बदर है। विगत ढाई वर्षों के शासन में जितनी असफलताओं का, कुशासन का रिकॉर्ड राजस्थान में बना है वो एक लोकतांत्रिक त्रासदी है। कोरोना महामारी की पहली लहर में उससे  निपटने, कुशल आपदा प्रबंधन में विफल गहलोत अपनी सरकार बचाने के लिए होटल-दर-होटल पर्यटन करते रहे अपने विधायकों को करवाते रहे, घोड़े खरीदते रहे.....जनता के दर्द से कोई वास्ता नही था। 

ठीक इसी तरह दूसरी लहर में भी उनकी भूमिका एक दिग्भ्रमित, अकुशल और कमजोर प्रशासक की रही, बार-बार बदलते तुगलकी फरमान, चिकित्सकीय व्यवस्थाओं हेतु केंद्र को कोसना, बढ़ती मौतों पर राजनीति, लॉक डाउन की विसंगतियों, तथा कमजोर प्रशासनिक पकड़ के कारण कितने ही घर उजड़ गए। ततपश्चात वैक्सीन पर केंद्र पर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगाने, स्वयं द्वारा विदेशी वैक्सीन खरीदने की योजना बनाने व बात-बात पर केन्द्रनीत भाजपा सरकार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को पानी पी पी कर बुरा भला कहने में उन्होंने कोई कमी नही रखी, हमेशा वो मुख्यमंत्री कम केंद्र के नेता प्रतिपक्ष ज्यादा नजर आए। बड़ी विचित्र बात है कि स्वयं के कोरोना से कभी के ठीक होने के बाद भी स्वयं को 15 अगस्त तक कोरेन्टीन किये हुए है.....यह विश्व के चिकित्सा जगत में पहला मामला है, जबकि जनता उनके अनलॉक से खुले आम अपनी दैनिक जीवन को जी रही है। 

सत्ता मोह के साथ-साथ गहलोत का शुरू से ही संघ के प्रति विद्वेष भी जग जाहिर है। समय-समय पर वो संघ, उसके कार्यों व नेतृत्व पर वैचारिक विष वमन कर चुके है। ग्रेटर जयपुर प्रकरण में संघ के क्षेत्रीय प्रचारक श्री निम्बाराम जी भाई साहब को भी एसीबी द्वारा आरोपियों की की श्रेणी में रखना निश्चित रूप से गहलोत की लाक्षागृही कूट रचना का एक हिस्सा है। 

अशोक गहलोत को अखिल भारतीय स्तर पर संघ की शक्ति सम्पन्नता का पूर्ण आभास है, 2014 से अब तक केंद्र और अनेकों राज्यो की सत्ता से कॉंग्रेस का हाथ धो बैठना महज एक संयोग नही है, वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उस दिव्य वैचारिक शक्ति का परिणाम है जो शाखाओं के माध्यम से समाज की रगों में प्रवाहित होकर तेजी से राष्ट्रवाद का प्रस्फुटन कर रही है, समाज जाग गया है कि किन ताकतों ने किन उद्देश्यों के लिए सनातन हिन्दू समाज को विखंडित कर अपना राजनीतिक आधार मजबूत किया है, किसने उसे अपने ही पुरखों के देश में पराया बनाया है, किसने देश के संसाधनों को लूटा है, किसने तुष्टिकरण के नाम पर देश के महान धार्मिक आधार को समाप्त किया है, किसने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हिन्दू को केवल और केवल दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर आतंकियों के हाथों मरने को मजबूर किया है, किसने उसकी मेहनत की कमाई से अपने और जेहादियों के महल बनाये है, किसने हिन्दू को जातियों में बाँट कर अपना हित साधा है, किसने उसके आराध्य राम के अस्तित्व को नकारा है, किसने अयोध्या-काशी-मथुरा में भव्य मंदिरों के पुनर्निर्माण में रोड़ा अटकाया है, किसने किसान, मजदूर, शोषित, पीड़ित, वंचित, गरीब, आदिवासी, महिलाओं के अधिकारों का हनन कर उन्हें ऊंचा नही उठने दिया है, किसने विदेशी आक्रमणकारियों को हमारा भाग्य विधाता घोषित किया है, किसने विधर्मी जेहादियों व आतंकियों का हमेशा वोट बैंक की राजनीति के चलते पोषण किया है.....। और भी अनेकों बातें है जो इस देश का हिन्दू समाज अब जान गया है तथा जाग गया है उसका यह तेजोमय जागरण ही कांग्रेस के अवसान का प्रमुख कारण है। और यही बात गहलोत व उसके समस्त आकाओं के हृदय में शूल की तरह चुभती है।

यह जागरण मात्र एक दिन में नही आया है, यह संघ की 96 वर्षों की अखण्ड साधना है जिसका दीपक परम् पूजनीय डॉ हेडगेवार जी ने प्रज्वल्लित किया था, जिसको काल के अंधडों से परम पूजनीय श्री गुरुजी ने सुरक्षित रखा, इस दीप में बाती बनकर राष्ट्रदेव की अर्चना में स्वयं के अस्तित्व को समर्पित कर देने वाले हजारों वीतराग, ध्येयवृति, श्वेताम्बर सन्यासी स्वरूप प्रचारकों तथा स्वयं को घृत बना कर आहूत कर देने वाले लाखों-करोड़ों स्वयंसेवकों, उनके परिजनों का वो त्याग और समर्पण है जो प्रतिदिन की एक घण्टे की शाखा में खेले गए खेलों, तथा भारत माता की आराधना में गाई जाने वाली प्रार्थना "नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे.." का परिणाम है जो विगत की 5 पीढ़ियों द्वारा सर्वस्व उत्सर्ग के बाद आज भी बिना किसी व्यक्तिगत उत्कोच की भावना से विश्व गगन में गुंजायमान की जा रही है। 

संघ की स्थापना से अब तक 3 बार कॉंग्रेस की सरकारों ने इसे समाप्त करने की भावना से प्रतिबंधित करने का कार्य किया, प्रथम बार 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप में,  दूसरी बार 1975 मे आपातकाल में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के प्रयासों में भाग लेने हेतु और तीसरी बार 1992 में प्रभु श्री राम मंदिर निर्माण आंदोलन में सक्रियता व जनजागरण करने की बात पर.....। परिणाम क्या हुआ...?।

संघ स्वर्ण की तरह इस विरोध की अग्नि में दग्ध होकर और अधिक निखर कर उभरा....विपक्षी और विरोधी हताश हुए....। पूरे भारत में काँग्रेस और उसी की कोख से जन्मे राजनीतिक दलों, वामपंथियों ने जहाँ-जहाँ सत्ता प्राप्त की प्रथम प्रयास संघ को कमजोर करने हेतु किया, कार्यकर्त्ताओं को प्रताड़ित करने से लेकर उनकी नृशंस हत्यायें तक हुई और हो रही है पर राष्ट्रनिर्माण के कंटकाकीर्ण पथ को जिन्होंने स्वयं अपने लिए चुना है वो स्वयंसेवक कभी झुका नही, रुका नही और इन झंझावातों से टूटा नही अपितु अपने लक्ष्य को साधने, समाज जीवन के समस्त क्षेत्रों को छूने की योजना को परिणाम तक पहुँचाया जिसके कारण आज समाज का कोई भी क्षेत्र, वर्ग, कार्यकलाप ऐसा नही है जहाँ संघ का प्रवेश नही है। 

आज समाज भी अपनी सुरक्षा, सेवा व राष्ट्रीय कर्तव्यों को निर्वहन करने में संघ की तरफ ही देख रहा है। जब-जब समाज और देश पर किसी भी प्रकार का संकट, आपदा या अन्य कठिनाइयों का दौर आया संघ का स्वयंसेवक डटकर खड़ा हुआ तथा उसने उन संकटों से समाज व देश की रक्षा की। आज जब कोरोना की वैश्विक महामारी से विश्व पीड़ित है, संघ की शाखाओं से निकले स्वयंसेवकों ने एक निष्काम कर्मयोगी की तरह सेवा के उच्चतम प्रतिमान स्थापित किये है जिसकी विश्व समुदाय ने भी हृदय से प्रशंसा की है। 

यही वो कार्य है कि आज समाज और जन सामान्य संघ के साथ खड़ा है, उसकी विचारधारा व बातों को स्वीकार्यता दे रहा है तथा अपने मूल अस्तित्व को पहचान रहा है, वो इन छद्म सेक्यूलर दलों, पारिवारिक राजनीतिक दलों व देश की संस्कृति विरोधी राजनीति से दूर हो रहा है, गहलोत जी का दर्द भी यही है।

संघ के प्रचारक निस्वार्थ, निःस्पृह, वीतराग सन्यासियों की तरह होते है जो अपना सम्पूर्ण जीवन, जीवन के भौतिक सुखों, परिवार के मोह, कर्तव्यों को त्यागकर केवल और केवल भारत माता की जय को समस्त भू-मण्डल पर गुंजायमान करने की भावना से मन मस्त फ़क़ीरी धारण कर  घर छोड़ कर निकलते है......, सुंदर सपने, नव आकर्षण उन्हें रोक नही पाते, उनको महलों के वैभव से क्या लेना? वो खुले आकाश तले सुख से सोते है, वो स्वयं को धन्य मानते है कि ईश्वर ने उसे इस जगजननी की सेवा का अवसर दिया है....वो भाग्यशाली है, वो जानते है कि इसी भूमि के वायु-जल से उनके शरीर का पोषण हो रहा है अतः यह देह इसी राष्ट्रदेव की अर्चना में, इस यज्ञ में समिधा स्वरूप समर्पित करनी है, उसका लक्ष्य केवल " परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं..." है वो इसी की प्राप्ति हेतु जीवन जियेगा।

गहलोत जी.... क्या इस प्रकार की भावना से जीने वाले वाले प्रचारक की कामना केवल करोड़-दो करोड़ कागज के नोटों की प्राप्ति की रही होगी, क्या उन्हें सत्ता का मोह रहा होगा, क्या वो अपनी इतनी महानतम भूमिका को त्यागकर एक बिचौलिए बनेंगे, क्या वो अपनी दिव्य तपस्या, साधना को इतनी क्षुद्र भौतिकता की कामना हेतु नष्ट करेंगे....कदापि नही अशोक जी, कदापि नही...।

पुलिस, प्रशासन, एसीबी, राज, सत्ता सब पर आपका कब्जा है, आप कुछ भी कर सकते है, द्वापर में भी लाक्षागृह रचे गए थे, द्युत क्रीड़ा की कुटिलता भी की गई थी, द्रौपदी की पवित्रता को भंग करने का प्रयास भी हुआ था.......पर कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में इन सबके सूत्रधार लाशों के ढेर में परिवर्तित हो गए थे।

सत्य का सूर्य किसी नासमझ बादल से नही छिपता, वायु दीवारों से नही रुकती और समन्दरों पर बांध नही बनाये जा सकते। हमें यह भी पता है कि पेड़ काटने आये 'हाथ'  में छिपी कुल्हाड़ी के पीछे लगा लकड़ी का डण्डा किसका है....। 

हमारे ऋषियों, मनीषियों ने वेदों में यूं ही नही कहा है.. 

"सत्यमेव जयते"

अंततः सत्य ही विजित होगा, आप और आपके सिपहसालार, सहयोगी, जयचंदी मानसिकता के क्षत्रप इस जंग में धूल चाटेंगे यह तय है। चाहे जितना जोर लगा लीजिए......।

आदरणीय श्री निम्बाराम जी भाई साहब निष्कलंक होकर इस काजल कोठरी से निकलेंगे।

राष्ट्रकवि दिनकर जी ने कहा है।

" जो लाक्षागृह में जलते है,

  वो ही शूरमा निकलते है।

@ नरेश बोहरा "नरेन्द्र" (नाड़ोल)

   (स्वयंसेवक) 9928588548

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