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जो लाक्षा-गृह में जलते हैं.......

अंततः वही हुआ जो सत्ता के मदान्ध नेतृत्व के मन में तय था....।

जयपुर ग्रेटर नगर निगम भ्र् ष्टाचार प्रकरण में वायरल हुए वीडियो को आधार बनाकर पूर्व नियोजित रूप से राजस्थान की एसीबी ने बिना किसी ठोस आधार के संघ के क्षेत्रीय प्रचारक जी को भी आरोपी बना लिया। कथित वीडियो में दिखाई मात्र दे रहे आदरणीय निम्बाराम जी भाई साहब को अन्य आरोपियों के समकक्ष मानकर राजस्थान की अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉंग्रेस सरकार ने अपनी उसी कुत्सित मानसिकता का परिचय दिया है जो कभी उनके पूर्वर्ती राष्ट्रीय नेतृत्व की रही है। 

संघ की स्थापना से अब तक 3 बार कॉंग्रेस की सरकारों ने इसे समाप्त करने की भावना से प्रतिबंधित करने का कार्य किया, प्रथम बार 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप में,  दूसरी बार 1975 मे आपातकाल में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के प्रयासों में भाग लेने हेतु और तीसरी बार 1992 में प्रभु श्री राम मंदिर निर्माण आंदोलन में सक्रियता व जनजागरण करने की बात पर.....। परिणाम क्या हुआ...?।

संघ स्वर्ण की तरह इस विरोध की अग्नि में दग्ध होकर और अधिक निखर कर उभरा....विपक्षी और विरोधी हताश हुए....। 

संघ की शाखाओं से निकले स्वयंसेवकों ने एक निष्काम कर्मयोगी की तरह समाज में सेवा के उच्चतम प्रतिमान स्थापित किये है जिसकी विश्व समुदाय ने भी हृदय से प्रशंसा की है। 

आज समाज और जन सामान्य संघ के साथ खड़ा है, उसकी विचारधारा व बातों को स्वीकार्यता दे रहा है तथा अपने मूल अस्तित्व को पहचान रहा है, वो इन छद्म सेक्यूलर दलों, पारिवारिक राजनीतिक दलों व देश की संस्कृति विरोधी राजनीति से दूर हो रहा है, गहलोत जी के दर्द का कारण भी यही है।

संघ के प्रचारक निस्वार्थ, निःस्पृह, वीतराग सन्यासियों की तरह होते है जो अपना सम्पूर्ण जीवन, जीवन के भौतिक सुखों, परिवार के मोह, कर्तव्यों को त्यागकर केवल और केवल भारत माता की जय को समस्त भू-मण्डल पर गुंजायमान करने की भावना से मन मस्त फ़क़ीरी धारण कर  घर छोड़ कर निकलते है......, सुंदर सपने, नव आकर्षण उन्हें रोक नही पाते, उनको महलों के वैभव से क्या लेना? वे खुले आकाश तले सुख से सोते है, वे स्वयं को धन्य मानते है कि ईश्वर ने उसे इस जगजननी की सेवा का अवसर दिया है....वो भाग्यशाली है, वो जानते है कि इसी भूमि के वायु-जल से उनके शरीर का पोषण हो रहा है अतः यह देह इसी राष्ट्रदेव की अर्चना में, इस यज्ञ में समिधा स्वरूप समर्पित करनी है, उनका लक्ष्य केवल " परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं..." है अतः वो इसी की प्राप्ति हेतु जीवन जिएंगे।

गहलोत जी.... क्या इस प्रकार की भावना से जीने वाले वाले प्रचारक की कामना केवल करोड़-दो करोड़ कागज के नोटों की प्राप्ति की रही होगी, क्या उन्हें सत्ता का मोह रहा होगा, क्या वो अपनी इतनी महानतम भूमिका को त्यागकर एक बिचौलिए बनेंगे, क्या वो अपनी दिव्य तपस्या, साधना को इतनी क्षुद्र भौतिकता की कामना हेतु नष्ट करेंगे....कदापि नही अशोक जी, कदापि नही...।

पुलिस, प्रशासन, एसीबी, राज, सत्ता सब पर आपका कब्जा है, आप कुछ भी कर सकते है, द्वापर में भी लाक्षागृह रचे गए थे, द्युत क्रीड़ा की कुटिलता भी की गई थी, द्रौपदी की पवित्रता को भंग करने का प्रयास भी हुआ था.......पर कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में इन सबके सूत्रधार लाशों के ढेर में परिवर्तित हो गए थे।

सत्य का सूर्य किसी नासमझ बादल से नही छिपता, वायु दीवारों से नही रुकती और समन्दरों पर बांध नही बनाये जा सकते। हमें यह भी पता है कि पेड़ काटने आये 'हाथ'  में छिपी कुल्हाड़ी के पीछे लगा लकड़ी का डण्डा किसका है....। 

हमारे ऋषियों, मनीषियों ने वेदों में यूं ही नही कहा है.. 

"सत्यमेव जयते"

अंततः सत्य ही विजयी होगा, आप और आपके सिपहसालार, सहयोगी, जयचंदी मानसिकता के क्षत्रप इस जंग में धूल चाटेंगे यह तय है। 

आप चाहे जितना जोर लगा लीजिए...... आदरणीय श्री निम्बाराम जी भाई साहब निष्कलंक होकर इस काजल कोठरी से निकलेंगे।

'राष्ट्रकवि दिनकर' ने भी कहा है.....

जो लाक्षा-गृह में जलते हैं, 

वे ही शूरमा निकलते हैं। 


@ नरेश बोहरा "नरेन्द्र" (नाड़ोल)

   (एक स्वयंसेवक) 9928588548

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