प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप सनातन धर्म व संस्कृति के रक्षक के रूप में एक ऐसा नाम जो युगों-युगों तक भारतवर्ष सहित विश्व के विभिन्न भागों में तब तक गूंजता रहेगा जब तक कि कोई भी व्यक्ति, सङ्गठन या देश अपनी राष्ट्रीय अस्मिता, धार्मिक स्वतंत्रता तथा स्वाभिमान की रक्षा व सम्मान हेतु लड़ता रहेगा।
भगवान श्री राम से भी पूर्व से चली आ रही सूर्यवंश की गौरवशाली क्षत्रिय परम्परा में विश्व के सबसे प्राचीन राज्य मेदपाट मेवाड़ जिसे पुरातन काल में चित्रकूट भी कहते थे उस चितौड़ की धरा के उज्ज्वल कीर्ति वाले राजवंश सिसोदिया कुल में जहाँ जन्मे महाराणा बप्पा रावल जिनके घोड़ों की टापों की गूंज आज भी हिंदुकुश के पर्वतों में आज भी गूंज रही है, जिनकी तलवार का स्वाद चखे म्लेच्छों के वंशज आज भी उनकी बसाई नगरी रावलपिंडी के नाम को बदलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए इन्ही के कुल में आगे महाराणा मोकल व कुम्भा, सांगा जैसे कुशल प्रजापालक, वीर व अद्वितीय योद्धा, महारानी पद्मावती व कर्मावती जैसी सती मातृशक्ति का प्रादुर्भाव हुआ। वहीं वीर प्रसूता माता जयवंती बाई की कोख से पिता महाराणा उदयसिंह जी के "प्रताप" को उच्च शिखर पर स्थापित करने वाले वीरवर महाराणा प्रताप का जन्म विक्रम संवत 1597 ज्येष्ठ मास शुक्लपक्ष की तृतीया को हुआ था। जन्म स्थान कुम्भलगढ़ दुर्ग या पाली इसमें मतभिन्नता है। (उस समय 9 मई नही हुआ करती थी, यह अंग्रेजी की गुलामी बाद में आई)।
बाल्यकाल से ही प्रताप के प्रताप का सूर्य प्रखरता से प्रकट हो रहा था, उसकी किरणों से मुगल अकबर से युध्द में चितौड़ खो चुके महाराणा उदयसिंह व अन्य राजपुरुषों सहित सम्पूर्ण मेवाड़ का जनमानस का हृदय शुभ की आशा से आलोकित हो रहा था। काल की कुटिल चालों ने प्रताप के प्रताप को कम करने के उद्देश्य से उन्हें राजगद्दी से दूर करने की कोशिशें की परन्तु उस तेजपुंज के महत्व को समझने वाले सामन्तों व जनश्रेष्ठियों ने इस मंथरा वृति को सफल नही होने दिया।
मेवाड़ की वो राजगद्दी जो एक प्रकार से शूलों की सजावट थी पर आसीन होते ही इन दृढ़ निश्चयी, वीर नरपुंगव ने मेवाड़ की अस्मिता, स्वतंत्रता, हिन्दू संस्कृति, गौ, ब्राह्मण, सुर, सन्त व जनता रूपी ईश्वर की रक्षा का दृढ़ व्रत धारण किया। मेवाड़ को पूर्ण म्लेच्छ मुक्त किये बिना मोहे कहा विश्राम के मंत्र को लक्ष्य बनाकर कार्य आरंभ किया, दीनता, हीनता व पराजय की मार झेल चुका मेवाड़ का जनमानस पुनः वीरवर प्रताप के तेज से ऊर्जा प्राप्त कर सिंह के समान जागने लगा था।
अपनी आँखों में तिनके की तरह चुभ रहे मेवाड़ का यह पुनरुत्थान दिल्ली के तख़्त पर बैठकर सम्पूर्ण हिन्द को दारुल इस्लाम में परिवर्तित करने के सपने देखने वाला अकबर कब इसे स्वीकार करता उसने अपनी कुटिल नीति का फिर प्रयोग किया.....।
सूर्यवंश के किसी भी सूर्य ने आज तक इस्लामिक आक्रमणकारियों से आगे स्वयं को बादलों की ओट में नही छुपाया यह पीड़ा अकबर को सदैव आहत करती थी। अपने दरबार में सिर झुकाते, मनसब पाकर आनन्दित होते, उसके हुक्म की तामील में कनीज़ों की तरह अदब बजाते भारत के अनेक राजमुकुटों के मध्य मेवाड़ के चिन्ह को नही देख पाना उसके लिए असहनीय था।
अकबर ने योजनाबद्ध रूप से हिन्दू को हिन्दू के विरुद्ध लड़ने भेजा,
"भाई पर भाई टूटेंगे, भाग मनुज के फूटेंगे" (दिनकर)
राजा मानसिंह जो जयपुर के अधिपति थे, अपनी हजारों वर्षों की शौर्य परम्परा, क्षात्र तेज, स्वाभिमान को विस्मृत कर अपनी तेग अकबर के आगे कुछ निहित स्वार्थों के चलते गिरवी रख चुके थे ने तुरन्त हुक्म बजाया और चल पड़े मेवाड़ जीतने....चिड़िया बाज से, हिरण सिंह से और बादल सूरज से लड़ने निकल पड़ा।
महाराणा प्रताप जिन्हें पता ही था कि वो राज का सुख भोगने जन्मे ही नही है, तैयार ही थे। साहस, बल, शौर्य, तेज की यह साक्षात भगवान एकलिंग की प्रतिमूर्ति जब राष्ट्र अस्मिता, हिन्दू गौरव, संस्कृति संरक्षण के पवित्र उद्देश्य से युद्ध को निकली तो मेवाड़ की धरा के जाए जन्मे मौन नही रहे....।
अपने महान वीर, दृढ़ इच्छाशक्ति के स्वामी महाराणा प्रताप से निरंतर मिल रहे प्रेरणा पाथेय से तृप्त जनमानस क्या क्षत्रिय, क्या वैश्य, क्या ब्राह्मण.. भील, मीणा, गरासिया, कोल-किरात, किसान, मजदूर, खेतिहर, लौहे, सोने, कपड़े व अन्य कार्य करने वाले, समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े सभी एक आवाज में उठ खड़े हुए.....सभी के अंदर सोया क्षात्र भाव जागृत हो गया, हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए लड़े गए इस युद्ध में सभी माताओं ने अपने पुत्र, वीरांगनाओं ने पति तथा बहनों ने भाइयों को प्रेरित किया, हल्दीघाटी की रणभूमि में प्रत्यक्ष लड़ने वालों के अलावा बाहर युद्ध की अन्य व्यवस्थाओं को संभालने वालों की भी एक बड़ी संख्या थी।
जो वामपंथी इतिहासकार हल्दीघाटी के युद्ध को मात्र महाराणा प्रताप-अकबर के मध्य का युद्ध कहते है उन्हें बताना चाहूंगा कि यह संग्राम सनातन संस्कृति और म्लेच्छ वृति, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय, स्वाभिमान-गुलामी, स्वतंत्रता-हजूरियत, गौरवशाली अस्मिता- बर्बर मानसिकता, आर्य-अनार्य की लड़ाई थी, जिसका लक्ष्य "धर्मो रक्षति रक्षितः" था, यह वही युद्ध था जो 5 हजार वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में पांडवों ने, 2 हजार वर्ष पूर्व चाणक्य के नेतृत्व में चन्द्रगुप्त ने, बाद में पुष्यमित्र शुंग, सम्राट पृथ्वीराज चौहान, महाराज सुहेलदेव, महाराणा बप्पा रावल, कुम्भा, सांगा, राजा हेमचन्द्र, राजा दाहिरसेन आदि ने लड़ा था यह उसी की पुनरावृत्ति थी।
महाराणा प्रताप-मानसिह के मध्य एक दिवसीय हल्दीघाटी के युद्ध ने इतिहास को बदल के रख दिया। राष्ट्र के स्वाभिमान हेतु लड़ रहे वीर योद्धाओं ने किसी शासक की क्रूर राजसी लिप्साओं की पूर्ति हेतु लड़ रहे वेतनभोगी सेनापति और सैनिकों को धूल चटा दी। इस युद्ध में राष्ट्रीय और सनातन की रक्षार्थ लड़ रहे नेतृत्व कर्ता पुरुष महाराणा प्रताप के जीवन को बचाने में दिया गया गोगुन्दा के वीर झाला मान का बलिदान सदैव वन्दनीय रहेगा।
विश्व के युद्धों के इतिहास में यह पहला अवसर था जब यहाँ वीरता मनुष्यों के साथ-साथ समुद्र मंथन से निकले रत्न गज और अश्व के वंशजों रामप्रसाद हाथी और चेतक घोड़े ने भी अद्भुत वीरता व स्वामिभक्ति का कालजयी प्रदर्शन कर स्वयं को अमरता प्रदान की।
वामपंथी मानसिकता से ग्रस्त, सरकारी मानदेय पर फले फूले इतिहासकारों की दृष्टि में भले ही हल्दीघाटी का युद्ध अकबर ने जीता हो, लेकिन आज भी उस भूमि की पवित्र माटी महाराणा प्रताप सहित उन समस्त योद्धाओं की जय जय कार कर रही है, जो वहाँ मातृभूमि व धर्म की रक्षार्थ लड़े और बलिदान हुए।
हमें आज महाराणा प्रताप की वीरता, मजबूत इच्छाशक्ति, युद्ध कौशलता के साथ-साथ सामाजिक समरसता निर्माण, सङ्गठन शक्ति, एकताभाव व प्रजावत्सलता के उस अद्भुत कौशल की भी चर्चा करनी होगी जो उनके इस राष्ट्र रक्षार्थ लड़े युद्ध में कारगर रही। सैकड़ो वर्षों से हिन्दू समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग युद्ध कौशल से विमुख हो चुका था तथा अन्य कार्यो में लगकर अपनी शस्त्र विद्या विस्मृत कर चुका था, उसके घर से हथियार नष्ट हो चुके थे, तो कुछ वीरों के पास शस्त्र कला थी, पर उसका प्रयोग धर्मयुद्ध के बजाय आपसी संघर्ष में ही हो रहा था तो समाज कुछ वर्ग युद्ध की रणनीति, प्रबंधन, व्यवस्था निर्माण में परम्परागत रूप से प्रवीण तो था परन्तु हनुमानजी की की तरह वो भी इस शक्ति को भूल चुका था,
महाराणा प्रताप ने सभी के सोए कौशल, शक्ति व शौर्य भाव को जगाने हेतु जन सेना का निर्माण किया, सभी को शस्त्र कला में निपुण होने का आह्वान किया, वनबन्धुओं को गले लगा कर पुनः श्रीरामजी-निषादराज का मिलन याद करवाया, उनकी शक्ति व युद्ध कला को राष्ट्रीयता से ओतप्रोत किया, राणा पुंजा भिल को अपना भाई कहा तो मेवाड़ के वीर योद्धा, कुशल रणनीतिकार भामाशाह जो वैश्य समाज के थे उनकी प्रबंधन योग्यता का समुचित उपयोग कर इसे धार दी। साथ ही अपनी प्रमुख टोली में समाज के हर वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान किया तथा उनके सुसुप्त युद्ध कौशल व शक्ति को जागृत किया यही कारण था कि उनकी सेना में राजपूत समाज के साथ साथ अन्य समाज के भी अनेक वीर योद्धा थे जो हल्दीघाटी में उनके साथ मुगलों से वीरतापूर्ण लड़े।
महाराणा प्रताप ने मातृभूमि की स्वतंत्रता तक राजसी सुखों के भोग का निषेध कर प्रजा में एक ऐसा सन्देश दिया की प्रजा भी राजा का अनुकरण कर सीमित आवश्यकताओं से जीवन जीने लगी और स्वयं को आगामी परिस्थितियों हेतु तैयार कर लिया। गाडोलिया लोहारों ने भी इसी तरह की भीष्म प्रतिज्ञा लेकर सेना हेतु युद्ध सामग्री तैयार की।
हिन्दू समाज में इस सामूहिकता व एकता व सङ्गठन भाव को जगाने का जो कार्य महाराणा प्रताप ने किया वो उनकी कीर्ति को सदैव उज्ज्वल रखेगा। युद्धों के पश्चात जब चावण्ड को राजधानी बना महाराणा प्रताप ने राजसत्ता संचालन किया तो उन्होंने इसी समरसता भाव को बनाये रखकर सभी वर्गों के हितों का एक पिता की भांति पोषण किया, उनके राज्य में खुशहाली व विकास का जो उत्कृष्ट कार्य हुआ वो उनकी प्रजावत्सलता का श्रेष्ठ उदाहरण है।
संवत 1654 में उनके निर्वाण के बाद उनके वँशजो में यह प्रजावत्सल भाव पुनः महाराणा राजसिंह जी के समय ही देखा गया। उन्होंने भी सनातन हिन्दू धर्म व संस्कृति के रक्षक योद्धा की तरह ही शासन किया।
महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी वहाँ के नागरिकों में हिन्दू संस्कृति के प्रति सामूहिक गौरव बोध जगाकर उन्हें सँगठित किया, तथा मुगलों से संघर्ष में विजयी हो हिन्दू पद पादशाही की स्थापना की।
स्वामी विवेकानंद हमेशा हिन्दू समाज के जिस गौरव के जागृत होने की कामना करते थे और "उत्तिष्ठ जागृत...." का आह्वान करते थे वो महाराणा प्रताप के युग में हुआ यही जागरण भाव था जो विधर्मियों से बिना झुके एक हो कर लड़ता रहा।
गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने यही भाव धारण कर हिन्दू धर्म की रक्षार्थ "खालसा " पंथ की स्थापना की।
अंग्रेजी शासन काल में हिन्दू गौरव को पुनर्प्रतिष्ठित करने, हिंदुओं में व्यक्तिगत दोषों से विमुख हो देश धर्म व संस्कृति की रक्षा हेतु संगठित होने तथा भविष्य के समर्थ भारत निर्माण करने का जो भाव आद्य सरसंघचालक परम् पूजनीय डॉ हेडगेवार जी ने 1925 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा के माध्यम से जगाना आरम्भ किया उसका मूल स्रोत भी महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरुगोबिंद सिंह, स्वामी विवेकानंद का वो एकता मंत्र ही रहा है, जिसका परिणाम आज समाज मे स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है।
आज महाराणा प्रताप जी का 481 वा जन्मदिवस है, आज हम सबको पुनः प्रतिज्ञाबद्ध होने की आवश्यकता है क्योंकि आज देश और धर्म पर अनगिनत खतरे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मंडरा रहे है, अधिकाँश हिन्दू समाज अर्ध सुसुप्तावस्था, निजी हित ज्ञान, व अनेकों विभाजनों से विखंडित है। समाज का कुछ प्रतिशत अंग ही जाग्रति के काम में लगा हुआ है,
खतरों का तूफ़ान हमारे सांस्कृतित किनारों से निरंतर टकरा रहा है उसे कमजोर कर रहा है, बचाव के काम में लगे धर्मयोद्धा अत्यल्प है तथा विधर्मियों के पास सँख्या बल सहित अनेक संसाधन है।
हमें जगना होगा ठीक उसी तरह जब हल्दीघाटी के युद्ध से पूर्व मेवाड़ का बच्चा-बच्चा जगा था, जिसने उस विधर्मी जेहादी अकबर की सेना व मनोबल दोनों को तोड़ कर उसे उसकी औकात बताई थी। याद रखिये उस समय भी सेनापति हिन्दू राजा मानसिंह था आज भी बन्दूक मानसिंह के कंधे पर ही है। लेकिन हमें बिना विचलित हुए
"हिंदुआ सहोदरा सर्वे,
न हिन्दू पतितो भवेत,
मम दीक्षा, हिन्दू रक्षा,
मम मंत्र समानता "
के उद्घोष के साथ आगे बढ़ना है।
दिवंगत वीर रस कवि माधव दरक जी अपनी कालजयी रचना...
"मायड़ थारो वो पूत कठे..?
वो एकलिंग दीवान कठे..?
वो महाराणा प्रताप कठे...?"
में जो प्रश्नचिन्ह लगाया था आज उन्हें भावांजलि देते हुए हमें उनका प्रश्नचिन्ह हटाते हुए इन पंक्तियों के साथ गगन गुंजायमान करना होगा...।
"मायड़ थारो वो पूत अठे..।
वो एकलिंग दीवान अठे..।
वो महाराणा प्रताप अठे...।"
सादर
जय भारत
जय एकलिंगनाथ
जय महाराणा प्रताप
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@ नरेश बोहरा "नरेन्द्र" (नाड़ोल)
विश्व हिन्दू परिषद जोधपुर प्रान्त
सह प्रचार-प्रसार प्रमुख
9928588548
बहुत खुब नरेशजी 🙏🚩🙏
ReplyDeleteसर धन्यवाद
Deleteइणी भावना री घणी दरकार है
ReplyDeleteसही बात है जीजी सा, यही समय की मांग है।
Deleteअनेकता में एकता यही हिंदुस्तान की संस्कृति है, और उसी के अनुरूप नरेश जी भाई साहब ने मेवाड़ हिंदुआ सूरज श्री प्रताप सिंह जी का जो आपने अपनी लेखनी से उनका बहुत ही सुंदर चित्रण व गुणों को शब्दों में पिरोया है वह अकल्पनीय है! बधाई शुभकामनाएं इसी तरह और भी महापुरुषों की जयंती के अवसर पर उनका चित्रण कर पाठकों को जाग्रत करें! जय गोडवाड़, जय मेवाड़, जय मारवाड़ ✍️🌺🙏
ReplyDeleteसादर धन्यवाद सा।
ReplyDeleteबहुत खूब भाईसाहब 🙏🚩👍
ReplyDeleteआज सभी को इसी मातृभक्ति कि जरूरत व दरकार है।
ReplyDeleteजय एकलिंग जी
जय महाराणा प्रताप
जबरी हैं आपरे कलम री धार, जबरा हा मेवाड़ी सिरदार।
ReplyDeleteवंदन हैं आपरी शब्दांजलि ने, नमन एकलिंग दीवान ने।।
जय राणा प्रताप की 🚩🚩🙏🙏बहुत सुन्दर नरेश जी 🌹👍🙏
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