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कृषि और पशुपालन- भारतीय सन्दर्भ में

हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़साने बयां होंगे

बहारें हम को ढूँढेगी, न जाने हम कहाँ होंगे।

लगभग यही कहा आज मुझे मेरे खेत में बकरियाँ चराने आये पशुपालक चरवाहों ने अपनी मातृभाषा में.......

"की अब कौन इतने पशु पालेगा, रेवड रखेगा, नई पीढ़ी यह काम लगभग छोड़ चुकी है....." जब तक हम डाँग (लाठी), पोतिये (पगड़ी) वाले है तब तक यह है, बाद में आप इसे किताबों में पढोगे...."।

रोजी-रोटी की खोज में दिसावर जाकर सेटल्ड हुई आज की पीढ़ी के लोग क्या यह कार्य कर सकते है...?

उत्तर होगा... नहीँ।

खेत की मेड़ के पेड़ काटकर हम लोग तारबन्दी करवा चुके है, क्योकि जंगली सूअर, नीलगायों व गाँवो के बेसहारा पशुओं से फसल की रक्षा जो करनी है।

जंगल नष्ट करके हमनें बस्तियाँ बसा ली...., पारस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा गया, तेंदुए, भेड़िए व अन्य मांसभक्षी जानवर विलुप्ति की कगार पर आ गए और परिणाम यह कि सुवर, नीलगायों की सँख्या बढ़ गई वो अब गाँवों-खेतों की ओर रुख कर गए, भैस व जर्सी के अंधे मोह ने हमारी गौमाता को सड़क दिखा दी....! उसे बेसहारा कर दिया और नतीजन संकट मुड़कर फिर खेत और किसान पर ही आया जिससे हमें कँटीले तारों की बाड़ बनानी पड़ रही है...,उन्मुक्त चरने वाले भेड़-बकरियों के लिए भी यह विपदा जैसी ही है कि अब कोई मेड़ के पेड़ की डाली काटने व चराने हेतु चरवाहे को नही बुलायेगा...., कुछ कसर जो शेष थी वो आपसी वैमनस्यता, शंका ने पूरी कर दी जोतों का विभाजन द्रुत गति से हो रहा है...विस्तृत फैले खेत लघु फार्म हाउस बनकर रह गए है, समय की धारा अनुसार यह होना ही था। पशुपालक कहाँ जाएगा...?

पूर्वजों द्वारा सुरक्षित गौचर, ओरण जो इन मूक प्राणियों की निधि थी खाकी-खादी-बाबुशाही के गठजोड़ तथा हम मनुष्यों की अतृप्त लिप्साओं की बलि चढ़ गई। सुरसा के मुख की तरह फैलती हमारी इन अतिक्रमणकारी प्रवृत्तियों की जद में ओरण, गौचर, नदी, नाले, तालाब, अगोर, नाड़ी, खाड़ी, मैदान, रास्ते, जंगल, सब आ गए और उनका अस्तित्व समाप्त हो रहा है।

व्यवस्थाएं मौन है, सत्ता भूखी है और राज की स्याही पैसों से बिक चुकी है। कानून तो लूटे-पिटे राहगीर की तरह कोने में पड़ा सिसक रहा है, नियम कायदे शराब-शबाब के अड्डों पर मुजरा करते नजर आ रहै है। 

वनों, अरण्यों, गौधन व पशुओं-पशुपालकों की रक्षार्थ म्लेच्छों से युद्ध कर वीरगति को प्राप्त हुए हमारे शस्त्र धनी पुरखों की समाधियां, स्मृतिस्थल, थान जिन्हें हम मामाजी, झुंझारजी, भोमियाजी व अन्य पवित्र नामों से पुकारते आ रहे है, जो सदियों से हमें इनकी सुरक्षा की प्रेरणा देते रहे है। उन पवित्र स्थलों को ही हमने अपने आमोद-प्रमोद की जगह बना ली, उनकी याद में लगने वाले मेलें, होने वाले जागरण, सत्संग अब भौंडे प्रदर्शन और मनोरंजन की हमारी कुत्सित मानसिकता की भेंट चढ़ चुके है। अब कौन उनसे प्रेरित होगा।

फार्म हाउस, स्टड फार्म, टेक्निकल फार्मिंग, ब्रीड डवलपमेंट, ऑर्गेनिक फार्मिंग, बॉयो फर्टिलाइजर यूजेज, विदआउट यूरिया क्रॉप, फ़ूड प्युरिटी, A2 मिल्क डिमांड, फॉरेन बेस एग्रीकल्चर, टिश्यू कल्चर फार्मिंग, सीड्स डेवलपिंग, ऑर्गेनिक फ्रूट, फ्लावर एंड वेजिटेबल प्रोडक्शन...... जैसे अनेकों अंग्रेजी शब्दों के जाल में हम इन दिनों खेती-किसानी व पशुपालन को उलझा चुके है। 

लेकिन सोचिए....क्या हमारे पास यह सब कुछ नही था..?

उत्तर होगा ....था.. बहुत शुद्ध रूप में था जो हमारे पास था वो सर्वश्रेष्ठ था, वो इन विदेशियों के पास नही था, हजारों वर्षों से उत्तम कृषि की तकनीक से युक्त भारत का सनातन समाज इन अमूल्य ज्ञान व तकनीक को पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजता आया है। मुगलों के विनाशकारी आक्रमण, अंग्रेजों के आतंकी राज में भी हमने उसे पूर्ण खत्म नही होने दिया, गाँव के शैक्षणिक दृष्टि से अनपढ़ किसान ने, पशुपालक ने, उन समृद्ध परम्पराओं को प्राणों से भी आगे जोड़ सुरक्षित रखा। उसे विश्वास था कि जब हम पूर्ण स्वाधीन होंगे तब अगली पीढ़ी को इस तकनीकी की आवश्यकता पड़ेगी क्योंकि यही वो तकनीक और रहस्य है जिसके कारण यह भारतवर्ष हजार हजार सालों तक विश्व वन्दनीय और सोने की चिड़िया बना रहा, पर अफ़सोस...हमने 1947 की खंडित आजादी के बाद क्या किया...?

आजादी के तुरन्त बाद सत्ता संभालने वाले तत्कालीन राजकीय नेतृत्व ने जो केवल शरीर से भारतीय थे....जिनकी आत्मा तक अँग्रेजियत के रंग में आकंठ डूबी हुई थी, उन्होंने हमारी सामाजिक-धार्मिक उन्नत परम्पराओं, संस्कृति और ज्ञान को कचरा समझा, हमें अज्ञानी, मूर्ख, अशिक्षित तथा अवैज्ञानिक घोषित किया, हमारे पुरखों के सहेजे उन्नत कृषि के ज्ञान-विज्ञान, उच्च जीवन दर्शन व कुशल तकनीकी युक्त घरेलू कुटीर व लघु उद्योगों आर्थिक विकास के तरीकों को पिछड़ा व अमान्य बताकर उसे नष्ट भृष्ट करने का पूरा-पूरा दुष्प्रयास किया और वे सफल भी हुये।

हमारी शिक्षा व्यवस्था से भारत और भारतीयता को हटाया गया, गौरवशाली अतीत को अदृश्य किया गया , हमारे ज्ञान-विज्ञान व शौर्य को गौण दर्शाया गया, हमें कायर और कमजोर घोषित कर हजारों वर्ष प्राचीन हमारे देश की एक राष्ट्र की अवधारणा की समाप्त कर उसे अंधकार का काल बताया तथा नया सूर्योदय 15 अगस्त 1947 की खंडित अधूरी स्वतंत्रता प्राप्ति के दिन से होना घोषित किया।

हरित और श्वेत क्रांति के नाम पर सरकारों ने विदेशी अधकचरी कृषि तकनीकी का आयात कर उसे लागू किया, क्योकि वो करोड़ो के कमीशन से हमारे नेताओं व अफसरों, थोथे वैज्ञानिकों को पोषित कर रही थी, हमारे सोना उगलने वाले खेतों में सब्सिडी की मिठास मिलाकर अंग्रेजी रासायनिक खाद, कीटनाशक उड़ेले गए, शुद्ध अन्न से शुद्ध मन की अवधारणा वाला समाज जहर बुझे अन्न का भोगी बन गया। यह एक वैश्विक षड्यंत्र था जिसके हम आसान शिकार हुए।

जो गाय हमारी अर्थव्यवस्था का आधार थी, जो हमारी सनातन संस्कृति की पोषक थी, जो स्वयं सिद्ध आरोग्यदात्री थी उसे कम दूध देने वाली घोषित कर विदेशी तकनीकी से जन्में सुवर के वंशज जर्सी व होलेस्टियन पशु जैसे विष पैदा करने वाले जानवर को हमारे घरों में घुसेड़ा गया, जिसके चलते हमारी आर्थिक समृद्धि की आधार अनेकों स्वदेशी गौवंश की प्रजातियां नष्ट हो गई।

परिणाम यह कि तात्कालिक लाभ मिलने की लालसा व ज्यादा धन कमाने की मृगमरीचिका में भटका, सरकारों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी के जाल में अटका हमारा अन्नदाता किसान उसमे फंस गया। खेत रासायनिक जहर की प्रयोगशाला बन गए, यह जहर हमारी नई पीढ़ी को लील गया, पंजाब, हरयाणा, उत्तरी राजस्थान, पश्चिमी उत्तरप्रदेश जैसे प्रान्त आज इस रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों को झेलने वाले प्रमुख केंद्र हो गए। बीमारियां हर घर में डेरा डाले बैठ गई। कैंसर जैसे घातक रोगों ने कितने ही घर परिवार बर्बाद कर दिए आज हालात यह है कि रोगियों के आवागमन हेतु चलने वाली ट्रेन को भी लोग कैंसर एक्सप्रेस कहते है। गाय की जगह भैस व सुवर की नस्ल की गायों के लेने के कारण पौष्टिक दूध नही मिल रहा जिससे हमारा भविष्य का आधार बनने वाली संताने शुद्ध दूध, दही, घी जैसे सात्विक आहार से वंचित हो गई और परिणाम यह कि यह पीढ़ी उतनी सबल नही हो पा रही है जो पहले की थी।

अब आँखे खुल रही है, पुनःहमारी  प्राचीन कृषि व पशुपालन पद्वति को अपनाने, व लागू करने की शुरुआत विगत एक डेढ़ दशक से हुई है, सब कुछ खोने के बाद , बिखरने के बाद थोड़ा बहुत भी जो मिल जाये तो भी हम राख के ढेर से अग्नि प्रज्वलित कर सकते है। समय लगेगा.....नई सोच के युवा इन प्राचीन परम्पराओं को आधुनिकता के साथ समायोजित कर बदलाव ला रहे है, प्रयासरत है, अच्छी डिग्रियों के धारक युवा, अच्छे पैकेज व आर्थिक लाभों, विदेश में नोकरी जैसे प्रलोभनों को त्याग कर पुनः हमारी भारतीय परंपरागत उन्नत जैविक कृषि, उत्तम पशुपालन, नस्ल सुधार, गौवंश की हमारी श्रेष्ठ प्रजातियों यथा गीर, थारपारकर, राठी, साहीवाल, कांकरेज सहित अन्य देशी वंश के संरक्षण व संवर्धन में लगे है, नित्य प्रयोग हो रहे है तथा उत्तम परिणाम भी मिल रहे है।

किसान की आत्मनिर्भरता, उसके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने, आय में वृद्धि करने के सरकारी उपक्रमों व सरकार की भावनाओं का सार्थक परिणाम भी जब ही आएगा कि हम परम्परागत कृषि की पद्वति को अपनाए तथा उसमें आधुनिक तकनीक का यथायोग्य उपयोग करे। 

वर्तमान में विगत एक-डेढ़ वर्षों में कोरोना जैसी भयाक्रांत कर देने वाली महामारी के मध्य जिस प्रकार से हम चिकित्सा की प्राचीन आयुर्वेदिक पद्वति व प्रकृति की तरफ लौटे है और वहीं से आशा की किरण दिखी है ठीक उसी तरह इस महामारी के चलते प्रभावित हुई अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोजगारी का निदान यही है कि जिस आत्मनिर्भर भारत की योजना व परिकल्पना पर देश का शीर्ष नेतृत्व काम कर रहा है तथा कृषि व पशुपालन को जिस गम्भीरता से लिया जा रहा है उसमें पढे-लिखे युवाओं को भी आगे आकर अपनी महती भूमिका निभानी होगी तभी हम स्वस्थ, समृद्ध व आत्मनिर्भर, विकसित भारत बना सकते है।

@ नरेश बोहरा "नरेन्द्र"

    (नाड़ोल-राजस्थान)

 मो. 9928588548

Comments

  1. कृषि और पशुपालन- भारतीय सन्दर्भ में आपके विचार सराहनीय है इससे हमे भी अविस्मरणीय जानकारी मिलती हैं इसमें छुपे खजाने की जानकारी मिलती है
    धन्यवाद

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