देश की स्वतंत्रता के पश्चात जब लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव हुए उसमें जनता ने कॉंग्रेस को अपना भाग्यविधाता चुना क्योकि देश की आजादी के आंदोलन में उसका योगदान तथा महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू के प्रति विशेष श्रद्धाभाव के कारण उन्हें कॉंग्रेस पर पूर्ण विश्वास था कि वह ही भारत को हर मोर्चे पर अग्रगण्य रखेगी तथा देश का समुचित विकास कर जनआकांक्षाओं की पूर्ति कर सकती है। 1947 के बाद तथा प्रथम आम चुनावों से पूर्व ही देश के कुछ मूर्धन्य राजनेताओं को यह लगने लगा कि देश का नेतृत्व सिर्फ गोरे अंग्रेजों की कॉपी ही कर सकता है परन्तु उसके गौरवशाली अतीत, सांस्कृतिक विविधताओं, सनातन परम्पराओं तथा हिन्दू मानबिन्दुओं के संरक्षण के प्रति गम्भीरता नही दिखा सकता है और न ही विभाजन के तुरन्त बाद शुरू हुए कश्मीर मुद्दे, अनुच्छेद 370 सहित संविधान के हिन्दू कोड बिल पर अपनी कोई दूरगामी नीतियां बना सकता है, तब बंगाल के स्वतंत्रता सेनानी तत्कालीन उधोग मंत्री डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कॉंग्रेस के विकल्प के रूप में एक देशव्यापी राजनीतिक दल जिसका प्रमुख उद्देश्य भारतीयता को अक्षुण्ण रखना होगा के निर्माण के बारे में गम्भीर चिंतन किया तथा संघ के तत्कालीन सरसंघचालक परम् पूज्य श्री गुरुजी से मार्गदर्शन प्राप्त कर 1951 में "भारतीय जनसंघ" की स्थापना की। जनसंघ का आरंभ कश्मीर के भारत में सम्पूर्ण विलय व अनुच्छेद 370 के विरोध में हुए आंदोलन के नेतृत्व के साथ हुआ जिसमें डॉ मुखर्जी ने अपना बलिदान दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में माँ भारती की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर चुके तपे तपाये मंझे हुए कार्यकर्ताओं ने इसकी बागडोर संभाली और इसे अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने हेतु अथक परिश्रम किया जिसमें पूज्य पण्डित दीनदयाल उपाध्याय, अटलबिहारी वाजपेयी जी जैसे महामानव स्मरणीय है। दीनदयाल जी ने जनसंघ को एक वैचारिक धरातल प्रदान किया जो उसके विस्तार का आधार बना उसमें प्रमुख है एकात्म मानववाद, जिसमें देश के अंतिम व्यक्ति के उत्थान व कल्याण का सङ्कल्प था। दूसरा "सांस्कृतिक राष्ट्रवाद" जो कॉंग्रेस की तुष्टिकरण की नीति के विरुद्ध किया गया शंखनाद था। 1952 से 1967 तक के चुनावों में जनसंघ पूरे देश में उपस्थिति रखने वाला दल बन गया था तथा 5 राज्यों की संविद सरकारों में वो सहयोगी बना। जनसंघ ने कश्मीर के साथ-साथ गोवा मुक्ति, चीनी घुसपैठ, पाकिस्तानी आक्रमण सहित विभिन्न विषयों पर सरकार की उदासीनता व गलत निर्णयों के विरुद्ध कई जनांदोलन छेड़ कर जनमानस में गहरी पैठ जमाई। 1967 में पण्डित दीनदयाल जी की निर्मम हत्या के बाद आये शून्य को भरने का काम अटलबिहारी वाजपेयी जी, लालकृष्ण आडवाणी जी, नानाजी देशमुख, बलराज मधोक, जगदीश प्रसाद माथुर, राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी सहित अनेकों समर्पित महानुभावों ने किया तथा देश हित के विभिन्न विषयों पर , जनजागरण व आंदोलन के माध्यम से कॉंग्रेस की गलत नीतियों का विरोध किया तथा अपना जनाधार व वोट प्रतिशत बढ़ाया। 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल का विरोध संघ के साथ साथ जनसंघ ने मुखर होकर किया तथा उसके शीर्ष सहित अनेकों नेताओं ने जेलों में अमानुषिक यातनाएं सही तो कितने ही अनाम कार्यकर्ताओं ने अपना बलिदान दिया। आपातकाल के बाद बनी राजनीतिक परिस्थितियों ने जनता पार्टी को जन्म दिया तो जनसंघ ने उसमे अपना विलय किया, परन्तु आपसी खींचतान से जनता पार्टी बिखराव के कगार पर आ गई तथा उसके नेताओं ने जनसंघी नेतृत्व पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से खुद को दूर करने की मांग रखी जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नही हो सकती थी क्योकि सभी संघ के स्वयंसेवक थे तथा जनसंघ का निर्माण भी संघ के मार्गदर्शन में ही हुआ था, संघ से उसे वैचारिक पोषण प्राप्त होता था तो इस मुद्दे पर जनसंघियों ने जनता पार्टी से नाता तोड़ दिया। पुनः देश में राष्ट्रवाद की राजनीति का शून्य स्थापित न हो जाये इसी लक्ष्य से 6 अप्रैल 1980 को मुंबई में श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व व ओजस्वी वाणी "अंधेरा छटेगा, सूरज उगेगा, कमल खिलेगा" ने भारतीय जनता पार्टी को जन्म दिया।
भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सैद्धान्तिक विचारधारा में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, एकात्म मानववाद के साथ साथ गांधीवादी समाजवाद को भी अपनाया तथा पंच निष्ठाओं के प्रति कार्यकर्ताओं का समर्पण भाव जागृत कर कमल के निशान पर पहला चुनाव 1984 में लड़ा, इंदिरा जी की नृशंस हत्या के बाद बनी भावुकता की लहर में उसे मात्र 2 सीटें लोकसभा में प्राप्त हुई, कोई और व्यक्तिवादी राजनीतिक दल होता तो निराशा में डूबकर अपना बोरिया बिस्तर समेट लेता परन्तु एक दृढ़ वैचारिक आधार, प्रबल विचारधारा, ईमानदार नेतृत्व, प्राण प्रण से समर्पित कार्यकर्ताओं बल पर संघर्ष जारी रखा। अपने पूर्ववर्ती संकल्पों यथा अनुच्छेद 370 हटाने, समान नागरिक संहिता लागू करने तथा अंत्योदय के साथ उसका लगाव उसी दृढ़ता से जुड़ा रहा साथ ही उस समय देश के एक और अति गम्भीर विषय "अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण" के विषय को अपने 1989 के पालमपुर अधिवेशन में सर्वसम्मति से दल के सङ्कल्प पत्र में शामिल कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया तथा तुष्टिकरण के भयावह वातावरण में हिन्दू मानबिन्दुओं की सुरक्षा के अपने वचन को दोहराया, जिसके परिणामस्वरूप भाजपा को 1989 में बनी गठबंधन सरकार से अलग भी होना पड़ा तथा व 1992 में 4 राज्यों में अपनी सरकार खोनी पड़ी पर इस विषय से मुंह नही मोड़ा। लगातार अस्थिर सरकारों के बाद 1996 में वो दिन भी आया जब दशाब्दियों की तपस्या सफल हुई तथा श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी प्रथम गैर कॉंग्रेसी प्रधानमंत्री बने, राजनीतिक छुआछूत के शिकार बन 13 दिन में ही पद छोड़ना पड़ा पर झुके नही, पुनः 1998 में 13 माह व 1999 में साढ़े 4 वर्ष के कार्यकाल में जनमानस के कल्याण व भारत को विश्व पटल पर शक्तिशाली रूप में स्थापित करने हेतु अनेकों सार्थक कार्य सम्पन्न हुए, 1998 का पोकरण परमाणु परीक्षण उसमे एक मील का पत्थर था। 2004 से 2014 तक केंद्र की सत्ता से पुनः वनवास मिला परन्तु देशभर में भाजपा की पहचान, पैठ व राजनीतिक उपस्थिति बढ़ी तथा मतदाताओं में विश्वास का वातावरण बना। भारत के बड़े राज्यों की सत्ता का संचालन कर लोकहित के अभूतपूर्व कार्य किये गए। लेकिन देश की स्थिति विचारणीय बन रही थी, आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता, बढ़ता तुष्टिकरण, पड़ोसियों द्वारा बार-बार आँखे दिखाना, अमेरिका, चीन आदि शक्ति सम्पन्न देशों द्वारा भारत को दोयम दर्जे का समझना, प्रतिभा पलायन, रक्षा क्षेत्र में अनिर्णय, गिरती अर्थव्यवस्था ने भाजपा को पुनः स्थापित होने, अपनी महती भूमिका निभाने के लिए नेतृत्व करने का अवसर प्रदान किया तथा श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। देश के सामने एक नया सङ्कल्प दोहराया गया "सबका साथ-सबका विकास" यही राजधर्म बना और देश ने पुनः प्रगति के पथ पर कदम रखा, चुनोतियाँ अनेकों मुंह बाए खड़ी थी परन्तु जब प्रधानमंत्री ने प्रधान सेवक के रुप में काम सम्भाला तो एक एक समस्या समाधान की ओर अग्रसर होती गई, गरीब के कल्याण व अमीर के सम्मान को समर्पित सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में अनेकों कठिनाइयों के बावजूद भी श्रेष्ठतम कार्य किये। परिणामस्वरूप पुनः 2019 में जनता ने भाजपा व मोदीजी की नीतियों पर विश्वास जताया तथा 303 सीटें प्रदान की। यह विजय उस वैचारिक दृढ़ता की थी जो जनसंघ की स्थापना के प्रथम दिवस से अब तक उसके नेतृत्व ने कायम रखी तथा उस पर चले, यह उस विश्वास की जीत थी कि अंधेरा छटेगा.....। दूसरे कार्यकाल के आरंभ में ही उन ज्वलंत मुद्दों को सुलझाने का सार्थक कार्य हुआ जिसके लिए दशाब्दियों तक तपस्या की जा रही थी, 370 का निर्मूलन हुआ, श्री राम मंदिर के निर्माण का पथ प्रशस्त हुआ तथा देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जयकार गूंजने लगी। आज विश्व भारत की तरफ आशा से देख रहा है, शक्तिशाली राष्ट्र हमारे लिए बांहे फैलाये खड़े है, दुश्मन स्वयं अपने विनाश के कगार पर है, भारत का सनातनी गौरव का अनुभव कर रहा है तो वर्षों से वोट बैंक के पिटारे में कैद अल्पसंख्यक भी तीन तलाक जैसे बंधनो से मुक्त हो आगे बढ़ने की राह पर है। देश का मजदूर, किसान, विद्यार्थी, व्यापारी, उधोगपति, महिलाएं, चिकित्सक, सैनिक सभी सरकार की श्रेष्ठ नीतियों से लाभान्वित हो रहे है तथा देश नवीन रूप में उच्च पायदान पर खड़ा है। आज स्थापना के 41 वर्ष बाद जब भाजपा का कार्यकर्ता या आप व्यक्ति इस संघर्ष व सफलता की कहानी को पढ़कर सोचने लगेगा तो उसके पीछे एक ही बात दृष्टिपात होगी और वो है विचारधारा....। डॉ मुखर्जी, पण्डित दीनदयाल जी, अटल जी सहित जितने भी मनीषियों ने इसका नेतृत्व किया उनकी विचारधारा के प्रति दृढ़ आस्था, समर्पण व इस पर निष्काम कर्मयोगी की तरह चलने की इच्छा ने ही आज इस सफलता के स्वाद का आनन्द दिया है। देश में कॉंग्रेस एक आंदोलन करी सङ्गठन के रूप में स्थापित हुआ था उसकी कोई स्थिर विचारधारा कभी रही नही, अवसरानुकूल उसने व्यवहार किया। बाकी अन्य दलों का जन्म कॉंग्रेस की कोख से ही हुआ है वो दल मात्र व्यक्तिगत संस्था की तरह ही संचालित किए जा रहे है जिसमे उसके आका का वचन ही विचार के रूप में प्रकट होता है अतः उनका आधार भी सीमित है। भाजपा की विचारधारा का मूल आधार हमारी सनातन संस्कृति तथा चिंतन है जो उसे नित्य प्रेरणा प्रदान करता है यही उसकी सफलता का द्योतक है, जिस दिन भी इस पवित्र विचार से स्खलित हुए खतरा सामने दिखेगा।
@ नरेश बोहरा "नरेन्द्र" (नाड़ोल)
स्वतंत्र विश्लेषक 9928588548
जय श्रीराम
ReplyDeleteसही लिखा आपने आज काग्रेस अपने कर्मो ओर एक परिवार की चाटुकारिता के कारण गर्त की जा रही हैं|
ReplyDeleteजय श्री राम🙏🙏
ReplyDeleteबहुत सुन्दर नरेशजी 👍🚩👍
ReplyDeleteसत्य कथन है
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