मित्रों, राजनीति में "अटल" होना बहुत मुश्किल है, वो भी ऐसी ही धूल में जब आप उस जगह हो जहां से दीक्षा ही कंटकाकीर्ण पथ हो, अंधकार हो और ऐसे में जब सिर्फ संघर्ष ही आपका भाग्य हो तब तो राजनीति भी अखरती है। लेकिन ऐसे वातावरण में "हार नहीं मनाना..." का शंखनाद करते हुए बढ़ते जाना, सामुहिक सफलता के सोपान चढ़ना, लेकिन वो भी इस निर्लिप्त भाव से की "....मुझे राजनीति नहीं अच्छी लगती....और मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं न्यूनतम बनूंगा.... "। विभिन्न सम-विषम राजनीतिक उद्घोषों के दौर में, दल को और देश को शीर्ष पर स्थापित करने के लक्ष्य को थामे "क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं व्यक्तित्व में... का उद्घोष केवल और केवल "अजातशत्रु" अटलजी ही कर कर सकते थे। अटलजी ने ही कहा था कि जनता सरकार के अवसान के बाद जब लगा कि राजनीतिक विकल्प के रूप में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई तो एक हुंकार भरी थी कि "अँधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा"। 25 दिसंबर 1924 को साझीदार और बाल्यकाल से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक के रूप में 1951 में संघ ...
नरेश बोहरा "नरेन्द्र" (नाड़ोल) प्रान्त सह प्रचार प्रमुख विश्व हिन्दू परिषद जोधपुर प्रान्त (राजस्थान) का अधिकृत ब्लॉग पृष्ठ